मेजर जनरल शाहनवाज खान आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी
मेजर जनरल शाहनवाज खान का जन्म 24 जनवरी 1914 को पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले के एक गांव मटोर में हुआ था। वो आजाद हिन्द फौज के प्रसिद्ध अधिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय राष्ट्रीय सेना में एक अधिकारी के रूप में काम किया था। वो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाषणों से बहुत प्रभावित थे। 1944 में शाहनवाज खान को मांडले में प्रथम श्रेणी कमांडर नियुक्त किया गया। युद्व के बाद उनको राजद्रोह के लिए दोषी ठहराया गया, ओर ब्रिटिश भारतीय सेना द्वारा किये गए सार्वजनिक कोर्ट मार्शल में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। बाद में भारत में अशांति और विरोध के बाद भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ ने सजा को कम कर दिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने पर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक नाटकीय बदलाव आया। 15 अगस्त 1947 भारत को आजादी मिलने तक, भारतीय राजनैतिक मंच विविध जनान्दोलनों का गवाह रहा। इनमें से सबसे अहम् आन्दोलन, आजाद हिन्द फौज के 17 हजार जवानों के खिलाफ चलने वाले मुकदमे के विरोध में जनाक्रोश के सामूहिक प्रदर्शन थे। मेजर जनरल शहनवाज को मुस्लिम लीग और ले. कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन को अकाली दल ने अपनी ओर से मुकदमा लड़ने की पेशकश की, लेकिन इन देशभक्त सिपाहियों ने कांग्रेस द्वारा जो डिफेंस टीम बनाई गई थी, उसी टीम को ही अपना मुकदमा पैरवी करने की मंजूरी दी। मजहबी भावनाओं से ऊपर उठकर सहगल, ढिल्लन, शहनवाज का यह फैसला सचमुच प्रशंसा के योग्य था। हिन्दुस्तानी तारीख में ‘लाल किला ट्रायल’ का अहम् स्थान है। लाल किला ट्रायल के नाम से प्रसिद्ध आजाद हिन्द फौज के ऐतिहासिक मुकदमे के दौरान उठे इस नारे ‘लाल किले से आई आवाज-सहगल, ढिल्लन, शाहनवाज़’ ने उस समय हिन्दुस्तान की आजादी के हक के लिए लड रहे लाखों नौजवानों को एक सूत्र में बांध दिया था। वकील भूलाभाई देसाई इस मुकदमे के दौरान जब लाल किले में बहस करते, तो सड़कों पर हजारों नौजवान नारे लगा रहे होते। पूरे देश में देशभक्ति का एक वार सा उठता। 15 नवम्बर 1945 से 31 दिसम्बर 1945 के बीच का समय हिन्दुस्तान की आजादी के संघर्ष में टर्निंग पॉइंट था। यह मुकदमा कई मोर्चों पर हिन्दुस्तानी एकता को मजबूत करने वाला साबित हुआ। बाद में शाहनवाज खान ने घोषणा की कि वह अब से महात्मा गांधी के अहिंसा वाले मार्ग पर चलेंगे, ओर कुछ दिन बाद में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। 1952 में मेरठ से पहली बाद लोकसभा का सफलतापूर्वक चुनाव लड़ने के बाद खान का संसदीय जीवन शानदार रहा। वे 1951, 1957 में मेरठ निर्वाचन क्षेत्र से चार बार लोकसभा के लिए चुने गए। 1962 ओर 1971, 1967 ओर 1977 के लोकसभा चुनाव में मेरठ से हार गए। 9 दिसम्बर 1983 को 69 वर्ष की आयु में इस नायाब हीरे को हमने खो दिया।
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