इस्लामिक कैलेंडर की इब्तिदा
हमारे माशरे में कैलेंडर की बड़ी अहमियत है I कैलेंडर के जरिए हमको दिन, हफ्ते, महीनों और साल का पता चलता है I दुनिया की तमाम जानकारी हालात व वाक्यात का पता हमको कैलेंडर से ही पता लगता है I कब कौन-सा वाक्या, कब किस सन व तारीख में वाक्या हुआ था I दुनिया की कौमों के अलग-अलग कैलेंडर हैं, जो उन्होंने अपने रिवायात और रुनुमा होने वाले हालात व वाकिआत के मुताबिक तैयार कर रखे हैं और उसके मुताबिक अमल करते और अपने त्यौहारों और रस्मो रिवाज निभाते हैं I इन तमाम कैलेंडरों में इस्लामी कैलेंडर की खास अहमियत है I इसकी यह खासियत इसलिए है कि इस कैलेंडर का ताल्लुक चांद से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस कैलेंडर को कमरी कैलेंडर भी कहा जाता है I चांद अल्लाह तआला की एक मखलूकात में से एक मखलूक है I चांद अल्लाह तआला की अजीम निशानियों में से एक निशानी है I अल्लाह तआला ने चांद को सिर्फ रोशनी के लिए ही तखलीक नहीं फरमाया, बल्कि इसकी तखलीक के और भी मकासिद हैं I उनमें से एक माह साल को मालूम करने का एक जरिया भी है I
क़ुरआन मजीद में सूरत बकराह की आयत 189 में चांद के मुताल्लिक अल्लाह तआला का फरमान है जिसका तर्जुमा है कि “लोग आपसे नए महीनों के चांद के बारे में पूछते हैं I आप उन्हें बता दीजिए कि यह लोगों के लिए (पैमाना) औकात और हज के वक्त मुतउय्यन करने के लिए है” I इसी से कर्ज वगैराह और लोगों के वादों की मुकर्रर करदा मियाद मालूम होती है I औरतों की इद्दत का वक्त मालूम होता है I इसी से हमारे रोज़े की इफ्तार का भी ताअल्लुक है I मुसनद अब्दुल रज़ाक़ में हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर रज़ि. अ. से रिवायत है कि रसूल अल्लाह स. अ. ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने चांद को लोगों को वक्त मालूम करने के लिए बनाया है I इसे देखकर रोज रखो, इसे देखकर ईद मनाओ, अगर अब्र व बारिश की वजह से चांद ना देख सको तो 30 दिन पूरे कर लिया करो I इस रिवायत को इमाम हाकिम ने भी सही कहा है I (तफसीर इब्ने कसीर)
क़ुरआन मजीद में साल के बारह महीनों का जिक्र सुरह तौबा की आयत नंबर 36 में आया है जिसका तर्जुमा है कि “बेशक तादाद महीनों की अल्लाह के नजदीक बारह है जो अल्लाह की किताब (लोहे महफूज) के मुताबिक उस दिन से चली आ रही है जिस दिन अल्लाह ने आसमानों और जमीन को पैदा किया I उनमें चार हुरमत वाले यानि अदब के महीने हैं” I इस आयत से साफ जाहिर है कि महीनों की तादाद बारह है I चांद की मनाज़िल के हिसाब से हर महीना या तो 29 दिन का होता है या 30 दिन का I चूँकि इन महीना का तआल्लुक चांद से होता है इसलिए इन्हें क़मरी महीना और क़मरी साल कहा जाता है I
क़ुरआन मजीद आयत से यह साबित हो जाता है कि चांद की इस्लामी एहकामात और तालीमात का अहम जरिया है और इसके मुताबिक अहले इस्लाम को सरअयी हुक्म बजा लाना लाजमी व जरूरी है I इस्लामी बारह महीनों के नाम इस तरह हैं-1. मोर मुहर्रमुल हराम, 2. सफरुल मुजफ्फर, 3. रबी उल अव्वल, 4. रबी उल आखिर, 5. जमादीउल अव्वल, 6. जमादीउल आखिर, 7. रजबुल मुरज्जब, 8. शाबानुल मुअज्जम, 9. रमजानुल मुबारक, 10. शव्वालुल मुकर्रम, 11. जीक़ादह, 12. ज़िल हिज्ज़ा I
अफसोस इस बात पर है कि हम मुसलमान सिर्फ दो या तीन महीनों के नाम ही जानते हैं I हमारा एक बड़ा तबका इस्लामी महीनों के नाम से नावाकिफ हैं I इस्लाम की तारीखी वाकिआत को जानना तो बहुत दूर की बात है I मुफ्ती अब्दुल मुनइम का कहना है कि “छोटे बच्चे हों या बड़े, तालीम याफ़्ता हों या गैर तालीम याफ़्ता इस्लामी कैलेंडर की रोज़ाना की तारीखों से बिल्कुल गाफिल रहते हैं I एक टेलीविजन शो में बहस के दौरान एक मुस्लिम नौजवान से पूछा गया कि उस महीने का नाम बताएं जिसमें मुसलमान हज का फरीजा अदा करते हैं तो उसे नौजवान ने सर झुका कर शर्माते हुए बस इतना ही कहा कि मुझे रमजान और रबीउल अव्वल का महीना याद है बाकी महीनों के नाम मालूम नहीं हैं”I
लिहाजा हमको चाहिए कि हम अपने बच्चों को इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक महीनों के नाम से वाकिफ कराएं I ताकि वे अपनी जिंदगी में इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक इस्लामी इबादत और हम पर हर माह में लाजिम फ़राइज़ की जानकारी हासिल करके उन पर अमल कर सकें I
इस्लामिक कैलेंडर की शुरुआत कैसे हुई इसके बारे में मुफ्ती मुनइम फरमाते हैं कि “इस्लामी कैलेंडर से पहले अरब के लोग वाकिआत का सहारा लिया करते थे I जैसे आमुलफीलका का वाकिआ I लेकिन जब इस्लामी फुतुहात का सिलसिला बढ़ा और मुखतलिफ मुमालिक में गवर्नर मुकर्रर हुए तो उनसे खतों किताबत शुरू होने लगी और अहवालों वाकफियत के और हिदायत के लिए खुतूब भेजे जाने लगे तो उस वक्त तारीख व सन की जरूरत महसूस की गई” चुनांचे हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ि. अ. के दौरे खिलाफत में सैयदना अबू मूसा अशअरी रज़ि. अ. आप (हज़र तउमर रज़ि. अ.) ने खत लिखा कि आपकी तरफ से हुकुमत के मुखतलिफ इलाकों में खुतूत रवाना किये जाते हैं, मगर पर कोई तारीख दर्ज नहीं होती है I हालाकि तारीख लिखने के बेशुमार फवाइद हैं और रिकार्ड के महफूज़ रखने में इससे काफी मदद और सहूलियत होती है I मसलन हुकुमनामा कब जारी हुआ था, उस पर अमल कब से और कब तक अमल किया जाये I सैयदना उमर फ़ारूक़ रज़ि. अ. ने जब इस खत को पढ़ा तो इस खत को खूब सराहा और बहुत पसंद फ़रमाया I
चुनांचि आप रज़ि. अ. ने इस पर गौरो फ़िक्र और मशवरे के लिए अकाबिर सहाबा रज़ि. अ. को तलब फरमाया और उनके सामने सैयदना अबू मूसा अशअरी रज़ि. अ. की बात रखी I जब सबने इस तजवीज़ को पसंद फरमाया तो सैयदना फारूक रज़ि. अ. व. ने सबसे राय तलब की की इस्लामी कैलेंडर व तकवीम की बुनियाद कैसे रखी जाए और कहां सन इस्लामी की शुरुआत की जाए, इस सिलसिले में चार किस्म की राय सामने आईं (1) बाज़ हजरात ने राय दी कि रसूल स. अ. व. की विलादत बासआदत के साल से इस्लामी कैलेंडर व तकवीम का आगाज किया जाए, (2) दो बाज हजरात ने रसूल स. अ. व. को नबुब्बत से सरफराज किए जाने साल के साल से इस्लामी कैलेंडर को शुरू करने की राय दी, (3) बाजों ने हिजरत नबवी स. अ. व. के साल से इस्लामी कैलेंडर को शुरू करने की राय दी, (4) बाज हजरात ने आप स. अ. व. की वफात के साल से इस्लामी कैलेंडर शुरू किए जाने की राय दी I
इनमें से हर एक राय को सामने रखकर अकाबिर सहाबा के दरमियान बहस व मुब्गाहिसा और खूब गोरों खोज हुआ I आखिर में सैयदना उमर फारूक र. अ. ने फरमाया की विलादत या नबुब्बत की तारीख में दोनों में इख्तेलाफ है, इसलिए यह मुनासिब नहीं है I फिर वफात नबवी से इस्लामी साल का आगाज़ इसलिए मुनासिब नहीं क्योंकि यह साल मुसलमानों के लिए निहायत रंजोगम का है I रहा हिजरत नबवी का साल तो यह सबसे ज्यादा मुनासिब है, क्योंकि तबील मशक्कत और आजमाइश और उसे पर साबित कदमी के बाद हिजरत का हुक्म दिया गया I जो दर असल हक व बातिल के दरमियान वाजेह फर्क व इम्तेयाज़ करना है I ईमान के लिए इसमें आइंदा कामयाबी का पैगाम है, इस्लामी सल्तनत की बशारत है I मस्जिदे नबवी की बुनियाद और उसकी तामीर की खुशखबरी है, सुकून और चैन के साथ इस्लामी एहकाम पर अमल की बशारत है, फतेह मक्का की नवेद (खुशखबरी) है और मुजाहिदात पर कमर बस्ता होने और जानो माल वतन और जायदाद की कुर्बानियों के तुफेल में कामयाबी व कामरानी और फतहो नुसरत की अजीम बशारत है I सैयदना फारूक र. अ. की राय से सब ने इत्तेफाक किया और यहीं से इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत हुई” I आज जोकि सन 1447 हिजरी है I
हबीबुल्ला, एडवोकेट
जवाहर नगर, जयपुर
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