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इस्लामी हुकूमतों में जज़िया (टैक्स) धर्म परिवर्तन के लिए लगाया जाता था या शासन का खजाना भरने के लिए?

Jaipur

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आजकल आप सुनते आ रहे होंगे कि इस्लामी हुकूमत में ग़ैर-मुस्लिम से जज़िया लिया जाता था। और ये बात सुनकर बहुत से मुसलमान और गैर-मुस्लिम के दिल में आता है कि इस्लाम तो बहुत सख़्त है, क्यों कि अगर कोई गैर-मुस्लिम कमज़ोर, ग़रीब, विधवा हो तो उससे भी जज़िया लेंगे! ऐसी ग़लतफ़हमी का नुक़सान हम सबको होता है, लोग आपस में लड़ते हैं, नफ़रत फैलती है और हम अपनी ज़िंदगी में कभी तरक्की नहीं कर पाते और न ही इस देश को आगे बढ़ा सकते।

तो आइए इस मामले को अच्छे से समझ लेते हैं कि असलियत क्या है।

 

सबसे पहले ये समझिए कि किसी भी स्टेट या मुल्क को चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है

और अपनी जनता को सहूलतें (सुविधाएं) मुहैया कराने के लिए, तरक़्क़ी करने के लिए हुकूमत को खर्च चाहिए। ये पैसे हुकूमत जनता से टैक्स की शक्ल में लेती है और उन पर खर्च करती है, विकास करती है।

ये सिस्टम कोई नया नहीं है, ये शुरू से चलता आ रहा है। जब लोग किसी हुकूमत को मानने लगे, तो ये टैक्स का सिस्टम भी शुरू हो गया। आज भी यही सिस्टम जारी है।

 

पुराना सिस्टम – हिंदू शासन में

हिंदू शासन में जिन रूलर्स का ज़िक्र ज़्यादा होता है वो दो हैं – महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज।

शिवाजी के शासन में 5 तरह के टैक्स थे:

1 चौथ (25%)

चौथ का मतलब था कि किसी भी इलाके के कुल राजस्व का 25% शिवाजी की हुकूमत को देना पड़ता था।

ये असल में एक तरह का प्रोटेक्शन टैक्स था – अगर आप चौथ दे दो तो शिवाजी की फौज आपके इलाके पर हमला नहीं करती थी और आपको उनकी तरफ़ से अमन मिलता था।

2 सरदेशमुखी (10%)

इसके बाद एक और टैक्स लगता था जिसे सरदेशमुखी कहते थे।

ये 10% अलग से होता था और ये इस बात की निशानी थी कि शिवाजी को उस ज़मीन पर “सरदेशमुख” यानी असली मालिक का हक माना जाता है।

मतलब अगर किसी ने चौथ दे दी, फिर भी उसे सरदेशमुखी भी देनी पड़ती थी।

3 छोटे टैक्स (3% + 6%)

चौथ और सरदेशमुखी के अलावा कुछ छोटे टैक्स भी थे:

नदगुंडा टैक्स → 3%

पंत साचीव टैक्स → 6%

ये अलग-अलग मराठा अफसरों के लिए होते थे जो प्रशासन चलाते थे।

यानी शिवाजी के राज में कुल मिलाकर जनता पर 35-40% तक का टैक्स बोझ पड़ता था।

 

महाराणा प्रताप के शासन में 4 तरह के टैक्स थे:

1 ज़मीनी कर (लगान)

मेवाड़ राज्य में किसानों से लगान लिया जाता था जो ज़मीन की पैदावार का लगभग 25%–33% होता था।

मतलब अगर एक किसान की फ़सल 100 रुपये की हुई तो 25–33 रुपये सिर्फ लगान के तौर पर देने पड़ते।

2 व्यापार और मंडी कर

जो व्यापारी शहरों और मंडियों में सौदा करते थे उन पर अलग से व्यापार कर लगता था।

हर मंडी में माल बेचने पर अलग-अलग टैक्स देने पड़ते थे, जैसे आजकल मंडी शुल्क होता है।

3 पेड़-पौधों और घर पर टैक्स

गाँव के लोगों पर कभी-कभी अलग से घर टैक्स या जंगल/पेड़ टैक्स भी लगाया जाता था – मतलब जंगल से लकड़ी या चारा लेने के लिए भी पैसा देना पड़ता था।

मौजूदा सरकार के टैक्स

आज के भारत में कुल लगभग 13 तरह के टैक्स हैं, जिन्हें 3 कैटेगरी में बाँटा जा सकता है:

डायरेक्ट टैक्स = इनकम टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स, कैपिटल गेन, एसटीटी, टीडीएस/टीसीएस

इनडायरेक्ट टैक्स = जीएसटी (CGST/SGST/IGST), कस्टम्स, एक्साइज, वैट, टोल, एंटरटेनमेंट टैक्स

सेस/लेवी = एजुकेशन, हेल्थ, स्वच्छ भारत, कृषि कल्याण, प्रोफेशनल टैक्स

जो कि भारत के विकास के लिए जनता से लिए जाते हैं और ये सब से लिए जाते हैं – अमीर, ग़रीब, सब से। अगर कोई भिखारी भी 5 रुपये की हीना नमकीन खरीदता है तो उस पर भी टैक्स है और जो पैसा कमाया उस पर भी टैक्स है।

अब आते हैं इस्लामी हुकूमत के टैक्स पर

इस्लाम में हुकूमत दो चीज़ों पर चलती थी – ज़कात और जज़िया।

मुसलमानों पर ज़कात, सदक़ा-ए-फ़ित्र, क़ुर्बानी, नफ़्ली सदक़ा, हज वग़ैरह।

ग़ैर-मुसलमानों पर सिर्फ जज़िया।

 

जज़िया क्या है?

जज़िया अरबी माद्दा “जज़ा” से “फ़ि़लह” के वज़न पर एक लफ़्ज़ है। इस वज़न पर होने की वजह से इसके मानी हैं

बदला देने की हालत,

अदा करने की कैफियत,

क़ायम-मकामी (बदले में) करने का अंदाज़,

जनाशिनी का तरीक़ा,

किफ़ायत करना, फ़ायदा पहुँचाना या काम की अंजामदेही का तरीक़ा।

इसलिए “जज़ा-यजज़ी” के मानी हैं – बदला देना, अदा करना, फ़ायदा पहुँचाना और काम आना।

जज़िया किनसे लिया जाता था?

 

एक हदीस मुवत्ता इमाम मालिक 46 में आता है कि किनसे लिया जाएगा:

जो जवान हो,

आज़ाद हो (ग़ुलाम न हो),

अक़्लमंद हो (पागल न हो),

और क़ाबिल मर्द हो, जिस्मानी लिहाज़ से तंदुरुस्त।

और किनसे नहीं लिया जाता:

बच्चे,  औरतें,  ग़ुलाम,  ग़रीब जिनका कोई कमाने वाला न हो, बीमार और कमज़ोर।

मतलब ग़रीब, विधवा, मज़लूम, अक्षम से नहीं लिया जाता था।

 

कितना जज़िया लिया जाता था?

हदीस अबू दाऊद 3038 से पता लगता है कि ग़ैर-मुस्लिम से 1 दीनार जज़िया लेना है, वो भी साल में सिर्फ़ एक बार।

अब सवाल उठता है कि उस ज़माने में 1 दीनार की क़ीमत कितनी थी?

तो इब्न माजा 2402 से पता चलता है कि जितने में एक बकरा (sheep) आ जाए उतना!

यानी बस एक बकरे के बराबर साल का टैक्स। और अगर कोई देने की इस्तिआत (सामर्थ्य) नहीं रखता तो उसे माफ़ कर दिया जाता था, बल्कि बैतुलमाल से उसकी मदद की जाती थी।

इस्लामी हुकूमत की मिसाल

हमें इस्लामी इतिहास में वाक़या मिलता है कि हज़रत उमर रज़ि. के ज़माने में एक ग़रीब बूढ़ा ईसाई भीख माँगता दिखा। उन्होंने पूछा – तुम भीख क्यों माँग रहे हो? वो बोला – मेरे पास कमाने की ताक़त नहीं।

तो हज़रत उमर रज़ि. ने उसका खर्चा बैतुलमाल से बाँध दिया!

और सिर्फ़ इतना ही नहीं – जब मुस्लिम फौज को किसी इलाक़े से पीछे हटना पड़ा, तो वहाँ के ग़ैर-मुस्लिम से लिया हुआ जज़िया भी वापस कर दिया, ये कहकर कि –

“हम अब तुम्हारी हिफ़ाज़त नहीं कर सकते, इसलिए तुम्हारा टैक्स लौटा रहे हैं।”

अब बताइए, क्या आज की कोई मौजूदा सरकार ऐसा कर सकती है कि काम न होने पर जनता का टैक्स वापस दे दे?

नतीजा क्या निकला?

जज़िया गैर-मुस्लिम पर जबरी मज़हब बदलवाने (Force Conversion) के लिए नहीं,

बल्कि उनकी हिफ़ाज़त और स्टेट चलाने के लिए लिया जाता था – बिलकुल वैसे ही जैसे आज सरकार टैक्स लेती है।

इसलिए मीडिया की बातें सुनकर आपस में नफ़रत न बढ़ाएँ, बल्कि प्यार-मुहब्बत से सब मिलजुलकर रहें।

अल्लाह हमें सही समझने की तौफ़ीक़ दे (आमीन)।

(लेखक: मुहम्मद सोहैल)

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