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मोहर्रम की दस तारीख की अहमियत  

Jaipur

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मोहर्रम की दस तारीख को यौमे आशूरा कहा जाता है। मोहर्रम हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है। इसी महीने से नया हिजरी साल शुरू होता है। मोहर्रम की दस तारीख से इस्लामी तारीख की बहुत सी अहम घटनाएं जुड़ी हैं। इसीलिए इस महीने का मुसलमान बहुत आदर करते हैं।इस महीने की दस तारीख अर्थात यौमे आशूरा को पैगंबर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कुबूल हुई थी। मोहर्रम की दस तारीख को ही हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती भयंकर तूफान में घिरने के बाद जूदी पहाड़ पर ठहरी थी। यौमे आशूरा को ही हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फिरऔन के जुल्म से निजात मिली थी। इसी दिन हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को लंबी बीमारी से निजात मिली थी। दस मोहर्रम को ही हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट से बाहर निकले थे। आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को एक ऐसी घटना हुई थी, जिसका दुनिया की तारीख में महत्वपूर्ण स्थान है। इराक स्थित करबला में हुई यह घटना दरअसल सच और हक के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस घटना में पैगंबर हजरत मुहम्मद (स.अ.) के नवासे हजरत इमाम हुसैन (र.अ.) और उनके साथियों को शहीद कर दिया गया था। हजरत इमाम हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे। मोहर्रम की दस तारीख को अधिकतर मुसलमान रोजा रखते हैं। पैगंबर हज़रत मुहम्मद (स.अ.) ने कहा कि इस दिन यहूदी मूसा अलैहिस्सलाम की याद में रोजा रखते हैं, इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे मोहर्रम की नौ-दस या दस-ग्यारह तारीख का रोजा रखें।

 

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