इस्लाम में पानी की अहमियत और उसका संरक्षण
पानी इंसानी जिस्म के तमाम अहम हिस्सों की बुनियाद है, जैसे खून, स्पाइनल फ्लुइड (रीढ़ की हड्डी में मौजूद तरल), लार और जोड़ो का लुब्रिकेशन (चिकनाई)। यह जिस्म के दो-तिहाई वज़न का हिस्सा बनाता है और जिस्म का दर्जा-ए-हरारत कंट्रोल करता है। अगर इंसान को कुछ दिन भी पानी न मिले तो ज़िंदगी खत्म हो सकती है। सेहतमंद रहने, सफ़ाई और ज़ाती हाइजीन के लिए पानी बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा, खेती-बाड़ी और इंडस्ट्री में भी पानी की बहुत अहमियत है। साफ़ है कि पानी पूरी धरती और उसके बाशिंदों के लिए एक बुनियादी ज़रूरत है। इसी वजह से इस्लाम में भी पानी और उसके बचाव की बहुत ज़्यादा अहमियत दी गई है।
- अरब की सरज़मीं और पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.)
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अरब के रेगिस्तान में पैदा हुए। जहाँ पानी हमेशा से ही चिंता का विषय रहा है। पानी की अहमियत ने अरबी अदब, शायरी, इस्लामी फ़न और तामीरात को बहुत प्रभावित किया। इस्लामी शहरों की तामीर अक्सर मस्जिद के इर्द-गिर्द होती थी और उनमें वुज़ू के लिए बहता पानी, पीने के लिए फव्वारे और जानवरों के लिए पानी के हौज़ मौजूद होते थे। इन फव्वारों और हौज़ों पर अक्सर कुरआनी आयतें लिखी होती थीं जो पानी की पवित्रता और उसकी अहमियत बयान करती थीं। कुरआन कहता है: “हमने हर ज़िंदा चीज़ को पानी से पैदा किया।” (सूरह अल-अंबिया 21:30)। मुसलमान यक़ीन रखते हैं कि पानी अल्लाह की तरफ़ से एक नेमत और उसके वजूद व कुदरत का सबूत है। कुरआन में अल्लाह तआला हमें बारिश, नदियों, मीठे और खारे पानी पर ग़ौर व फ़िक्र करने को कहता है, ये सब उसकी रहमत और बख़्शिश की निशानियाँ हैं। “क्या वह (अल्लाह) बेहतर नहीं जिसने आसमान व ज़मीन पैदा की और तुम्हारे लिए आसमान से पानी बरसाया, जिससे खूबसूरत बाग़ात उगाए जिन्हें तुम कभी उगा नहीं सकते थे? क्या अल्लाह के साथ कोई और माबूद है? नहीं, बल्कि ये लोग बराबरी ठहराते हैं।” (सूरह अन-नम्ल 27:60)
- पानी की हिफाज़त और इसकी पाकी
पानी एक साफ़, बे-रंग, बे-बू और ख़ुशज़ायक चीज़ है, लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि इंसानी लापरवाही की वजह से अब पानी हर जगह गंदा होता जा रहा है। बारिश का पानी हवा की गंदगी से, नदियाँ और झीलें कूड़े-कचरे और रासायनिक ज़हर से, समंदर सीवेज और फैक्ट्रियों के कचरे से गंदा हो चुके हैं। करोड़ों लोग साफ़ पानी से महरूम हैं और गंदा पानी बीमारियाँ फैला रहा है। पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.) ने 1400 साल पहले ही इस बारे में चेतावनी दी थी। आपने पानी के स्रोतों के पास गंदगी करने, पेशाब-पाखाना करने से सख़्त मना फ़रमाया था। आप (स.अ.) ने फरमाया: “कोई शख़्स नींद से उठने के बाद बर्तन में हाथ न डाले जब तक कि उसे तीन बार न धो ले, क्योंकि वह नहीं जानता कि उसका हाथ रात को कहां-कहां लगा।” (अबू दाऊद)। आप (स.अ.) ने यह भी हिदायत दी कि खाने-पीने की चीज़ों को ढक कर रखा जाए और पानी के मटकों को बंद किया जाए ताकि उन्हें कोई गंदा न कर दे।
इस्लामी क़ानून और पानी का हक़
इस्लामी शरीअत में पानी को इंसानियत की साझा नेमत माना गया है। इसके दो अहम उसूल हैं:
हक़े-अतश (Right of Thirst) – हर इंसान और जानवर को प्यास बुझाने का हक़ है।
हक़े-सक़ी (Right of Irrigation) – फसलों की सिंचाई का हक़, ताकि ज़रूरतमंद किसान ज़मीन को ज़िंदा रख सकें।
पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.) की कई हदीसों में ये भी बताया गया है कि पानी पर किसका हक़ पहले है, कौन कितना पानी ले सकता है और पानी की फुज़ूलखर्ची से कैसे बचा जाए — यहाँ तक कि तब भी जब पानी भरपूर मौजूद हो। पानी एक अज़ीम नेमत है। जब बारिश होती है और सूखी धरती में जान आती है तो अल्लाह की रहमत हर क़तरे में महसूस होती है। लेकिन अल्लाह तआला अगर चाहे तो ये नेमत छीन भी सकता है: “और हमने आसमान से मीयारी (नियोजित) पानी बरसाया, फिर उसे ज़मीन में महफूज़ किया, और बेशक हम उसे वापस लेने की भी क़ुदरत रखते हैं।” (सूरह अल-मु’मिनून 23:18)। इस्लाम ये सिखाता है कि इंसान धरती पर अल्लाह का ख़लीफ़ा (custodian) है और उसे हर चीज़ की हिफ़ाज़त करनी है, चाहे वो जंगल हों, जानवर हों या पानी। कुरआन और हदीस हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि हमें पानी की कद्र करनी चाहिए, उसे गंदा नहीं करना चाहिए और हर इंसान को उसका हक़ मिलना चाहिए।
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