इस्लाम और जरूरतमंदों की मदद
अक्सर देखा गया है कि लोग जरूरतमंदों की मदद नहीं करते हैं। कुछ लोग तो इतने बड़े घर बना लेते हैं कि उन तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाता है। कई बार ऐसा होता है कि अगर कोई शख्स मदद के लिए कहे, तो उसे उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाना बेहतर समझते हैं। कई बार मदद मांगने वालों को लोग झिड़क देते हैं। लेकिन इस्लाम ने इस बात से लोगों को मना किया है। इस्लाम में लोगों की मदद करने के बारे में बताया गया है। इस्लाम में कहा गया है कि अगर कोई जरूरतमंद आपके पास आए तो उसे आप ‘न’ मत कहें। फकीरों और मांगने वालों के बारे में भी इस्लाम ने कहा है कि अगर कोई आपसे कुछ मांगे, तो उसे आप न मत कहें। गरबों, जरूरतमंदों और फकीरों को झिड़के नहीं।
मदद करना सवाब का काम
इस्लाम में बताया गया है कि अगर आप जरूरतमंदों, गरीबों और यतीमों की मदद करते हैं, तो यह सवाबा का काम है। इससे अल्लाह राजी होता है। इस्लाम में अमीरों को अपने माल में से देने का हुक्म दिया गया है। इस्लाम में कहा गया है कि नेकी सिर्फ वही नहीं है कि लोग अपने मुंह को पूरब और पश्चिम की तरफ फेर लें, बल्कि असल नेकी यह है कि जो अल्लाह पर, कयामत के दिन पर, कुरान पर ईमान लाए और माल से मोहब्बत के बावजूद गरीबों, मिस्कीनों और यतीमों की मदद करे। एक जगह कुरान में कहा गया है कि तुम्हारे माल के हकदार तुम्हारे मां-बाप हैं, करीबी रिश्तेदार हैं और यतीम हैं। इस्लाम में गरीबों की मदद को देखते हुए जकात को फर्ज किया गया है।
समाज की तरक्की
समाज की तरक्की का सबसे बड़ा मकसद मोहताजों, बेकसों, माजूरों, बीमारों, बेवाओं, यतीमों और बेसहारा लोगों की देखभाल है। यह मकसद तभी पूरा हो सकता है कि इन जरूरतमंदों की जरूरत पूरी की जाए और उन्हें माली ऐतबार से मजबूत बनाया जाए। इस्लाम में कहा गया है कि अगर आप अपने माल को जरूरतमंदों में खर्च करते हैं, तो आपके माल में बरकत होती है। एक जगह इरशाद है कि एक बार प्रोफेट मोहम्मद स। मस्जिद-ए-नबवी में थे, तभी उनके पास एक औरत किसी जरूरत से आई। आप स। ने देर तक उस औरत की बात सुनी। इसके बाद उसकी जरूरत को पूरा कराने का यकीन दिला कर उसे भेज दिया।
नौकरों की मदद
प्रोफेट मोहम्मद स। ने फरमाया है कि तुम्हारे नौकर तुम्हारे भाई हैं, अल्लाह ने उन्हें तुम्हारे अधीन कर दिया है। जो आपके आधीन हों, उन्हें वही खाना खिलाएं जो आप खुद खाते हैं, उसे वही कपड़े पहनाएं जो आप खुद पहनते हैं और उससे ऐसा काम न लें जो उसकी ताकत से ज्यादा हो, यदि कोई काम उसकी ताकत से ज्यादा हो तो खुद उसकी मदद करे।
मदद पर हदीस
“जाबिर रजि। कहते हैं कि नबी स। ने किसी मांगने वाल को “न” कहकर कभी वापस नहीं किया” (हदीस: बुखारी, मुस्लिम)
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