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शिक्षित युवाओं के उजड़ते सपने, देश की कमजोर होती रीढ़

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शिक्षित युवाओं के उजड़ते सपने, देश की कमजोर होती रीढ़

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हमारे देश में कुछ समय से अजीब-सी फितरत हो गई है। वह यह कि शिक्षा के क्षेत्र पर सबसे कम ध्यान दिया जा रहा है और उसमें भी विभिन्न प्रकार की कटौतियाँ की जा रही हैं। पिछले 20-25 साल से स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लगभग हटा दिए गए हैं। जिसके चलते ज्यादातर विद्यालयों में साफ-सफाई का कार्य विद्यार्थियों के भरोसे है। जिनमें भी निःसंकोच दलित वर्ग के विद्यार्थी ही यह कार्य अधिक करने को मजबूर होते हैं। गुरुमित्र, शिक्षामित्र, संविदा पर शिक्षक, ठेके पर शिक्षक, आदि रखने शुरु हुए थे जो आज भी बदस्तूर जारी हैं। अब तो कॉलेजों में भी सहायक प्रोफेसरों की नियमित भर्तियां बंद कर दी गई हैं और उनके स्थान पर एटीए (असिस्टेंट टीचिंग ऐसोसिएट्स) रखने शुरु कर दिए हैं। जो अग्निवीरों के तर्ज पर पांच-पांच साल के लिए करीब 28300/- प्रतिमाह पर रखे जाते हैं। जबकि कॉलेजों में सहायक प्रोफेसरों का शुरुआती बेसिक ही 57200/- होता है। इसके अलावा महंगाई भत्ता और मकान किराया अलग से मिलता है। शिक्षा के क्षेत्र में अनेक बेसिर-पैर की योजनाएं आज भी चल रही हैं, जिनके कारण पढ़ाई-लिखाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। लेकिन इस बात की चिंता किसको है?

माना कि शिक्षा का क्षेत्र राजस्व अर्जित नहीं करता है और विद्यार्थियों की फीस से तो फेकल्टी और स्टॉफ का वेतन निकालना भी मुश्किल है, भूमि, भवन आदि के रख-रखाव की तो बात ही अलग है। लेकिन सरकारें यह बात क्यों भूल जाती हैं कि शिक्षा से देश के भावी नागरिक तैयार होते हैं ? जितनी सुदृढ़ शिक्षा व्यवस्था होगी, देश भी उतना ही मजबूत होगा। किसी भी देश में परिवर्तन लाना हो तो सबसे पहले शिक्षा को बदला जाता है (यह कार्य वर्तमान में बखूबी से किया जा रहा है)। शिक्षा व्यवस्था किसी भी देश की रीढ़ की हड्डी होती है, क्योंकि हर क्षेत्र के व्यक्ति शिक्षा के जरिए ही तैयार किए जाते हैं। प्रशासनिक सेवक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अध्यापक, प्रोफेसर, क्लर्क आदि सभी इसी से तैयार किए जाते हैं। कॉलेजों में देश की भावी नस्लें तैयार होती हैं। यह कार्य सहायक प्रोफेसर, ऐसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर्स करते हैं। जब ये अपने भविष्य को लेकर ही आश्वस्त नहीं होंगे तो क्या तो छात्रों का भविष्य तैयार करेंगे और क्या ही देश का भविष्य तैयार करेंगे?

अन्य क्षेत्रों में सरकारें कितना खर्च करती हैं, उस पर टीका-टिप्पणी करने के बजाय मैं आगाह करना चाहता हूं कि सरकार के लिए राजस्व कमाने का साधन नहीं होते हुए भी शिक्षा का क्षेत्र सारे देश के भविष्य से संबंधित है। किसी भी देश को आगे बढ़ना हो तो नए-नए अपडेट्स लागू करने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए किसी जमाने में टाइपराइटर काम आता था, आजकल छोटी अदालतों तक में कंप्यूटर से काम होता है। अतः शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार जरुरी है। इसके अलावा अभी देश भर में नीट के पेपर लीक को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा है लेकिन सरकार तथा उसके अन्धभक्त लीपा-पोती करने में लगे हुए हैं। अगर शिक्षा मंत्री इतने ही ईमानदार हैं तो सादगी से इस्तीफा दे देते! जनता दोबारा मौका देती। लेकिन इस प्रकार मासूमों पर डंडे बरसाना, उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारना और कईयों को मौत की नींद में सुला देना- क्या यही सुशासन है आपका? भाजपा बड़े-बड़े महापुरुषों के केवल गुणगान ही करती रहती है, अपनाती नहीं है, अन्यथा लालबहादुर शास्त्री ने रेल दुर्घटना होने पर सबके मना करने के बावजूद रेलमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। यहां इतना सब कुछ होने के बावजूद सरकार इसे गंभीरता से नहीं लिया गया।

सार रूप में कहना चाहें तो बड़े ही दुख के साथ के साथ कहना पड़ रहा है कि शिक्षा के क्षेत्र में मनचाहे बदलाव करके देश का भविष्य बर्बाद किया जा रहा है। जब कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति देखेगा कि उससे कम पढ़ा-लिखा आदमी, जो चपरासी या बाबू है, वह तो कारों में घूम रहा है और वह स्वयं एमए, पीएच डी होकर भी टीचिंग ऐसोसिएट होने के कारण मात्र 28,000 रुपए प्रति माह में कॉलेजों में पढ़ाने को मजबूर है, तो क्या उसे अपनी शिक्षा और योग्यता पर अफसोस नहीं होगा। जब उसका अधिकांश समय अपनी आर्थिक स्थिति को अन्य साधनों से मजबूत करने में ही खर्च हो जाएगा, तो वह क्या तो रिसर्च करेगा, और क्या अपना योगदान देगा ? क्या वेतन का अंतर उसे अखरता नहीं होगा ? सरकारों को अगर कटौतियां करनी ही है तो कई अन्य क्षेत्र हैं जिनमें करें।

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धार्मिक स्थलों का विकास और देवी-देवताओं की मूर्तियां बनवाने का काम संबंधित धर्म के लोगों का है, सरकार को वहां धनराशि बर्बादी नहीं करनी चाहिए (केवल देवस्थान विभाग के मंदिरों को छोड़कर, जहां से आमदनी होती हो)। फालतू के स्टेच्यू लगवाना, कुंभ आदि के मेलों का आयोजन और व्यवस्था सरकारी खर्चे पर करना स्पष्ट रूप से जनता के धन की बर्बादी है और इसे रोका जाना चाहिए। साथ ही जो व्यक्ति जितनी बार विधायक-सांसद चुना जाता है, वह उतनी ही दफा पेंशन लेता है। इस बात पर कोई गौर नहीं करता! एक व्यक्ति को एक ही पेंशन मिलनी चाहिए, चाहे वह कितनी ही बार चुना जाए, क्योंकि खाने वाला मुंह और पेट तो एक ही है। कोई आदमी दस बार जनप्रतिनिधी चुना जाता है तो उसके 10 मुंह नहीं हो जाते हैं, फिर 10 बार पेंशन किसलिए? आजकल अच्छे से अच्छा मोबाइल हजार रुपए के अंदर रिचार्ज हो जाता है और महीने भर का नेट भी फ्री मिल जाता है, फिर जन प्रतिनिधियों को 15000/- मासिक टेलीफोन भत्ता क्यों दिया जाता है? इसी प्रकार के अन्य खर्चे बन्द होने चाहिए और इस राशि को शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। अतः सरकारों को अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करना चाहिए, ताकि युवा वर्ग में आक्रोश न हो।

नोट-इस लेख में निजी विचार प्रोफेसर के है।
श्याम सुंदर बैरवा, प्रोफेसर, भीलवाड़ा, राजस्थान

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