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हज़रत हसन बसरी र.अ.

लेख

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हज़रत हसन अल बसरी  इस्लामी इतिहास की पहली पीढ़ी (ताबेईन) में सबसे प्रमुख धार्मिक व्यक्तित्वों में से एक थे । वह एक विद्वान, उपदेशक, न्यायाधीश और सूफ़ी आंदोलन के  प्रारंभिक संत के रूप में जाने जाते हैं।  प्राचीन मुस्लिम साधकों में हसन अल बसरी सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। उन्होंने भारतीय साधुओं की तरह अपने जीवन में संन्यास को ही अधिक महत्व दिया था और दूसरे सूफी संतों की तरह रहस्यवाद को कम। वह सुन्दर, गोरे और नीली आँखों वाले बताए जाते हैं। हसन बसरी अपने गंभीर और संयमित स्वभाव के लिए जाने जाते थे।

इनका जन्म  मदीना में सन् 643 ई. 21 वीं हिजरी में हुआ था और मृत्यु (5 रजब 110 हिजरी) अक्टूबर 728 ईस्वीं में बसरा में  हुई थी । उनकी मज़ार बसरा में है।

हसन अल बसरी की मां ख़ैरा, हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहोअलैहवसल्लम   की  पत्नी हज़रत आयशा सिद्दीका र. अ. की परिचारिका (दासी)थीं। इनके पिता, पेरोज़, एक फ़ारसी दास थे जो दक्षिणी इराक़ से थे। हसन बसरी वास्तव में धनी थे और बसरा में हीरे-जवाहरात का व्यवसाय करने वाले जौहरी थे लेकिन व्यवसाय छोड़कर उन्होंने अपने लिए एक कष्टमय जीवन की राह चुनी। उनका पालन-पोषण मदीना में पैगंबर साहब के कुछ सहाबा (साथियों) के आसपास हुआ और उन्होंने ख़लीफ़ा हज़रत उमर और हज़रत अली से आशीर्वाद व ज्ञान प्राप्त किया। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने चौथे खलीफा हजरत अली से संन्यास की दीक्षा ली थी।उन्होंने कुरान, हदीस, धर्मशास्त्र (फ़िक़्ह) और अरबी भाषा की शिक्षा मदीना और बसरा में पैगंबर साहब के कई सहाबा से प्राप्त की। युवावस्था में उन्होंने पूर्वी ईरान के सैन्य अभियानों में भाग लिया । लगभग 657 ई. में वह बसरा चले गए, जहाँ उन्होंने एक उपदेशक और शिक्षक के रूप में ख्याति प्राप्त की। बसरा में बसे इसलिए उन्हें “अल-बसरी” कहा जाता है।  वह बहुत अच्छे कानून दां और कवि भी थे। उनकी वाणी का लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ता था। फरीदुद्दीन अत्तार ने उनके बारे में लिखा है कि वह बिल्कुल एकांत में रहते थे और किसी से भी उनकी कोई चाह नहीं थी। किसी ने भी उन्हें कभी हंसते हुए नहीं देखा था। वह अत्यंत त्यागी और भगवत्प्रेमी थे।उनके शिष्यों में सूफी भी थे और कट्टर मुसलमान भी। वह परमात्मा को सर्वातीत मानते थे, फिर भी उनका कहना था कि आत्मशुद्धि के द्वारा उसे पाया जा सकता है। अपने साथ रहने वाले एक फकीर सैयद जुबैर से उन्होंने एक बार कहा था कि संसार में तीन चीजों से हमेशा बचना चाहिए – 1. भूलकर भी सुल्तानों से संपर्क न रखें 2. किसी भी स्त्री के साथ एकांत में न रहें 3. किसी की बातों पर कान न दें।

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हज़रत हसन बसरी (रह०) फरमाते हैं कि मुझे मेरी जिंदगी में चार वाकिआत बोहोत अजीब लगे तो लोगों ने पूछा हज़रत वो कौन से वाक्यात है आप ने वाक्या फरमाया ?

(1) पहला वाक्या

-एक नौजवान के हाथ में चिराग था तो मैंने नौजवान से सवाल किया कि ये रोशनी कहाँ से आई तो जैसे ही मैंने ये पूछा कि ये रोशनी कहाँ से आई तो उस नौजवान ने फॉरन फूंक मारकर चिराग बुझा दिया और कहने लगा हज़रत जहाँ चली गई वहीं से आई थी।

आप ने फरमाया कि मैं उस नौजवान की हाज़िर जवाबी पर आज तक हैरान हूँ  !

(2) दूसरा वाक्या

i-एक बार दस बारह साल की एक लड़की आ रही थी उसकी बात ने मुझे हैरान कर दिया। बारिश हुई थी, मैं मस्जिद जा रहा था और वो बाज़ार से कोई चीज़ लेकर आ रही थी। जब ज़रा मेरे क़रीब आई तो मैंने कहा कि बच्ची ज़रा संभल कर क़दम उठाना, कहीं फिसल न जाना। जब मैंने ये कहा तो उसने आगे से जवाब दिया हज़रत मैं फिसल गई तो मुझे नुकसान होगा, आप जरा संभलकर कदम उठाना अगर आप फिसल गए तो कौम का क्या बनेगा ?

कहने लगे उस लड़की की बात मुझे आज तक याद है। उस लड़की ने कहा था कि आप संभलकर कदम उठाना अगर आप फिसल गए तो कौम का क्या बनेगा ?

(3) तीसरा वाक्या

-एक बार मैंने एक हीजड़े को देखा। जब उसे पता चल गया कि मैंने उसे पहचान लिया है तो मुझसे वो कहने लगा कि मेरा राज़ न खोलना अल्लाह तआला कयामत के दिन तुम्हारे राज़ों पर पर्दा डालेंगे।

(4) चौथा वाक्या

-एक आदमी नमाज़ पढ़ रहा था। उसके सामने से एक औरत रोती हुई खुले चेहरे, खुले सर के साथ उसके आगे से गुज़री जब उसने सलाम फेरा तो उस औरत पर बड़ा नाराज़ हुआ कि मैं नमाज़ पढ़ रहा था, तुझे शर्म नहीं आई तुझे ध्यान नहीं नंगे सर खुले चेहरे के साथ मेरे सामने से गुज़र गई औरत ने पहले तो माफी मांगी और फिर माफी मांगकर कहने लगी देखो मेरे मियाँ ने मुझे तलाक दे दी है ,और मैं उस वक्त गमज़दा थी, मुझे पता न चला कि आप नमाज़ पढ़ रहे हैं या नहीं। मैं इस हालत में आपके सामने से गुज़र गई मगर मैं हैरान इस बात पर हूँ कि तुम अल्लाह की मुहब्बत में कैसे गिरफ्तार हो कि खड़े हो परवरदिगार के सामने और देख मेरा चेहरा रहे हो। हसन बसरी रह० फ़रमाते हैं कि उस औरत की ये बात मुझे आज तक याद है ।

सन् 684-704 ई. के दौरान हसन बसरी र अ की उपदेशक गतिविधियाँ चरम पर थीं। उनके उपदेश दुनियावी लालसा और भौतिकवाद के खिलाफ थे और उमय्या शासकों की आलोचना करते थे।इराक के क्रूर गवर्नर अल-हज्जाज की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना के कारण उन्हें 705-714 ई. के बीच छिपकर रहना पड़ा। उन्होंने ख़लीफ़ा उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के शासनकाल में बसरा के न्यायाधीश (काज़ी) के रूप में भी काम किया।

हसन बसरी की शिक्षाओं का केंद्र दुनिया से बेरुख़ी और ईश्वर पर पूर्ण भरोसा था। उनकी

प्रमुख शिक्षाएं :-

  • दुनिया की नश्वरता: वह कहते थे कि दुनिया धोखेबाज है, “एक साँप की तरह, छूने में चिकनी लेकिन उसका ज़हर घातक है।”

* ईश्वर का भय और प्रेम: उनके अनुसार सच्चा मुसलमान न केवल पाप से बचे, बल्कि मृत्यु की निश्चितता और परलोक में अपने भाग्य की अनिश्चितता से उत्पन्न स्थायी चिंता में रहे। साथ ही, उन्होंने ईश्वर के प्रेम और ज्ञान की भी बात की।

* कर्म की स्वतंत्रता: ईश्वरीय नियति (क़दर) के बारे में बहस में, उन्होंने यह स्थिति ली कि मनुष्य अपने कर्मों के लिए पूर्णतः जिम्मेदार है, न कि ईश्वर।

* आत्म-निरीक्षण: धार्मिक आत्म-निरीक्षण (मुहासबा) पर जोर देते हुए, उन्होंने बुराई से बचने और अच्छे कर्म करने को प्रोत्साहित किया।

* सरल जीवन: उनका मानना था कि सांसारिक बंधनों को त्यागे बिना ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं। सच्चा वैराग्य केवल ईश्वर के लिए होना चाहिए, स्वर्ग पाने की आशा से नहीं।

हसन अल बसरी की प्रसिद्ध उक्तियाँ:

* “हे आदम की संतान, तुम कुछ दिनों से अधिक नहीं हो। जब भी एक दिन बीतता है, तुम्हारा एक हिस्सा चला जाता है।”

* “बुद्धिमान वह है जो ऐसा कोई काम नहीं करता जिससे उस (परलोक के) संसार को पाने में बाधा हो।”

* “इस संसार के प्रलोभनों में फंसकर उस दूसरे संसार को न बिगाड़ो।”

* दुनिया और आखिरात की तुलना पूर्व और पश्चिम से करते हुए कहा: “जितना तुम एक के करीब जाओगे, उतना ही दूसरे से दूर हो जाओगे।”

हज़रत हसन अल बसरी र अ की शख्सियत इस्लामिक दुनिया में ख़ास मरतबा रखती है।इनकी तालिमात से आज भी दुनिया फ़ैज़ हासिल कर रही है।

-फ़ज़लुर्रहमान

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