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धर्मों का ध्रुवीकरणः देश के लिए घातक

Jaipur

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वर्तमान में विघटनकारी ताकतों के हौंसले बढ़ते जा रहे हैं। जहाँ कहीं भी बात करो, यही सुनने में आता है कि ‘काँग्रेस के राज में मुस्लिमों को बहुत बढ़ावा दिया गया, हिन्दुओं को दबाया गया, अब अगर काँग्रेस की सरकारें आ गईं तो हिन्दुओं की खैर नहीं। मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दू जमीन-जायदाद, मकान-दुकान बेचकर जा रहे हैं मुस्लिम इलाकों में हिन्दुओं की बहु-बेटियों का बाहर निकलना मुश्किल है, आदि।’ यह सब नासमझ और तथ्यों से अनभिज्ञ जनता को भयभीत और अमित करना मात्र है। आज मीडिया इतना सशक्त है कि राई के बराबर घटना को भी पहाड़ बना कर पेश करता है। कहीं भी उपरोक्त जैसी कोई वारदात हो तो क्या मीडिया से छुपी रह सकती थी ? हाल-फिलहाल ऐसी कोई घटना कहीं की भी नजर नहीं आई कि भारत में अमुक स्थान पर मुस्लिम बहुल इलाके में हिन्दुओं को मुस्लिमों द्वारा भयभीत किया जा रहा हो, हिन्दू जमीन-जायदाद बेच कर जा रहे हों, हिन्दुओं को कत्ल किया जा रहा हो या उनके आसपास माँस आदि फेंका जा रहा हो। वास्तविकता तो यह है कि धीरे-धीरे भारत का हिन्दुकरण होता जा रहा है जो कि वर्तमान सत्ताधारी पार्टी भाजपा और आरएसएस का चिर-परिचित एजेण्डा रहा है। हर कार्यक्रम में हिन्दू रीति-रिवाज़ शामिल किए जा रहे हैं और सरकारी कार्यक्रमों में भी हवन-पूजन, मन्त्रोच्चारण देवी-देवताओं के पूजा-पाठ शामिल होते जा रहे हैं। पाठ्यक्रमों को अपनी विचारधारा ने अनुरूप ढाला जा रहा है, जो कि देश के इतिहास से खिलवाड़ करना है। बड़े ही सुनियोजित तरीके से ‘हिन्दू यानि भारत और भारत यानि हिन्दू स्थापित किया जा रहा है। कोई मुस्लिम स्कूल में नमाज़ पढ़ लेता है, तो बवाल हो जाता है (ब्यावर, राजस्थान सितम्बर 2024), उसे सस्पेण्ड कर दिया जाता है, लेकिन सरकारी पार्कों में मन्दिर बनाने और दफ्तरों में पूजा-पाठ करने पर कोई रोक-टोक नहीं है। यह सरकार की दोहरी नीति ही है। देश के निर्माण में अन्य धर्मावलम्बियों के योगदान को कमजोर किया जा रहा है। क्या इस देश के विकास में अन्य धर्मों का योगदान नहीं रहा? मेरे विचार से तो अकेले मुस्लिमों का आजादी में योगदान उन लोगों से अधिक रहा है जो वर्तमान में देशभक्ति का दम भरते हैं, जिनके पूर्वज अँग्रेजों से राय साहब, राय बहादुर, हिज हाइनेस, सर, राजा साहब, हिज मैजेस्टी, खान साहब, खान बहादुर और न जाने क्या-क्या उपाधियों को लिए फिरते थे और अँग्रेजों के लिए मुखबिर का काम करते थे।

आजकल पूर्णतः राजकीय और केन्द्रीय कर्मचारियों के अलावा अन्य कर्मचारियों की सबसे बड़ी समस्या पेंशन की है। यह सर्वविदित है कि अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा सरकार ने 2004 पहली बार एनपीएस लागू की थी। इसके बाद निर्बाध रूप से काँग्रेस की सरकारें चलीं, लेकिन यह योजना नहीं बदली गई। बाद में मोदी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा सरकारी कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना का लाभ नहीं देगी। इतना स्पष्ट होने के बावजूद भी बाद में दो बार वही सरकार चुनी जाती है तो यह कर्मचारियों का दुर्भाग्य ही है। हिन्दू, खासकर संघ से जुड़े कर्मचारियों ने दो-दो बार भाजपा को बहुमत से जिताया, जिसका परिणाम यह है कि कर्मचारी अपने भविष्य को असुरक्षित मान रहे हैं। आप स्वयं वोट देकर ऐसी सरकार को चुनते हैं जो आपके लिए ही नुकसानदायक हो तो दोष किसे दें? “आयेगा तो मोदी ही” खूब नारा लगाते थे लोग। अब मोदी आ गये हैं, लेकिन पेंशन बहाली के कोई संकेत नहीं हैं और लोग समय के साथ रिटायर होते जा रहे हैं। कुछ तो इन्तजार करते-करते मृत्यु को भी प्राप्त हो गये हैं। अब पेंशन नहीं मिल रही है तो क्यों दुखी हैं? जीवन-यापन का सहारा भले ही समाप्त हो जाये, पर हिन्दू राज्य स्थपित होना चाहिए। आज ध्रुवीकृत हिन्दुओं का यही लक्ष्य है।

हाल ही में कन्हैया लाल हत्याकाण्ड (उदयपुर) के तीन साल पूरे हुए। टी वी चैनल दिन भर इससे सम्बन्धित सामग्री बदल-बदल कर दिखाते रहे। कन्हैया लाल हत्याकाण्ड की जांच शीघ्र पूरी हो और दोषियों को कानून के अनुसार कठोरतम दण्ड मिले, हम यही कामना करते हैं। इस घटना के कुछ समय बाद ही 20 जुलाई 2022 को जालौर जिले के सायला उपखण्ड के सुराणा गाँव में एक 9 साल के बालक इन्द्रकुमार मेघवाल ने स्कूल में पानी की मटकी छू दी थी। उसके अध्यापक छैलसिंह राजपूत ने उसके कान पर डण्डे से इतना मारा कि नस फटने से 22 अगस्त 2022 को उसकी मृत्यु हो गई। हमारा पूछना यह है कि हिन्दुओं का खून तभी क्यों खोलता है जब मामला हिन्दू-मुस्लिम का होता है ? इन्द्रकुमार मेघवाल क्या हिन्दू नहीं था ? क्या उसकी निर्ममता पूर्वक हत्या नहीं हुई थी ? इस मामले में किसी भी हिन्दू संगठन द्वारा आरोपी को सजा दिलवाने की मांग क्यों नहीं की गई? राजपूत होने के कारण उसके खिलाफ कोई भी संगठन क्यों नहीं उतरा? अगर उसके स्थान पर कोई मुस्लिम अध्यापक होता तो हिन्दुवादी संगठन क्या इसी प्रकार चुप बैठते? एक पक्ष दलित और दूसरा पक्ष सवर्ण होने पर इनको साँप क्यों सूंघ जाता है? अध्यापक छैलसिंह के दो अपराध साफ नजर आ रहे हैं- एक तो अध्यापक होकर भी उसने न केवल छुआछूत की, बल्कि छात्र को निमर्मता पूर्वक मारा। दूसरा, उसकी मार के कारण छात्र की मौत हो गई। इतना होने के बावजूद भी हिन्दुओं की एकता का ढिंढोरा पीटने वाले संगठन मौन रहे, इसे क्या कहा जाये? धर्मों का ध्रुवीकरण सवर्ण हिन्दुओं और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए फायदेमन्द हो सकता है, लेकिन अन्ततः पूरे देश के लिए यह घातक है। चुन-चुन कर मुस्लिम काल में बनाई गईं इमारतें निशाने पर ली जा रही हैं। मुम्बई में एक जैन मन्दिर भी तोड़ा गया। कहा गया कि यह मन्दिर अवैध था। लेकिन लगभग हर पार्क में या सड़क पर सड़क के किनारे देश भर में लाखों मन्दिर बने हुए हैं, जिनको कोई कुछ नहीं कहता और न ही उन पर कोई कार्रवाही होती है। क्या ये सब किसी को नहीं दिखते हैं? यदि दिखते हैं तो इन पर कार्रवाही क्यों नहीं होती है? याद रखें, आज नहीं तो कल, नम्बर सबका आना है, अतः कोई इस मुगालते में नहीं रहे कि हम बच जायेंगे। दलितों पर पुरानी वर्जनाएं फिर लादी जा सकती हैं। अच्छे दिन आते देर नहीं लगेगी।                                                                                                                                                                                                                                                   डॉ. श्याम सुन्दर, बैरवा, भीलवाड़ा

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