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मृत्युभोज में मालपुए नहीं बने तो समाज से निकाला…सिरोही में अब पानी और राशन के लिए भी तरस रहे परिवार

मृत्युभोज में मालपुए नहीं बने तो समाज से निकाला…सिरोही में अब पानी और राशन के लिए भी तरस रहे परिवार

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सिरोही। राजस्थान के सिरोही जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सामाजिक बहिष्कार जैसी कुप्रथा पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक गरीब परिवार आर्थिक तंगी के कारण मृत्युभोज में घी के मालपुए नहीं बनवा सका। परिवार ने अपनी हैसियत के अनुसार सादा भोजन कराया, लेकिन यह बात समाज के कुछ पंचों को इतनी नागवार गुजरी कि उनका हुक्का-पानी बंद करने का फरमान सुना दिया। इतना ही नहीं पंचों ने इस गरीब परिवार का समर्थन करने वाले 42 अन्य परिवारों पर भी यही तुगलकी फरमान लागू किया गया। पंचायत के पंचों ने कुल 43 परिवारों को अब गांव में अलग-थलग कर दिए गए हैं। जिससे उनका सामान्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हो गया है। इतना ही नहीं अब परिवारों को न दुकानदार राशन दे रहा है, न ही कुएं से पानी नहीं भरने दिया जा रहा है। पंचों की बंदिशें यहीं नहीं रुकीं। पीड़ित परिवारों के घरों में मेहमानों के आने और उनके किसी रिश्तेदारी में जाने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई है। पंचों के फरमान की अनदेखी करने पर 11 हजार रुपए और पूरे समाज को सामूहिक भोजन (जीमण) का दंड भुगतना होगा।

मृत्युभोज में नागवार गुजरा सादा भोजन

यह पूरा मामला सिरोही जिले के बरलूट थाना क्षेत्र के मंडवारिया गांव का है। पीड़ित परिवारों ने अब जिला कलेक्टर से शिकायत की है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि गांव निवासी सदाराम पुत्र बलवाजी का 5 जून को निधन हो गया था। इसके बाद 17 जून को मृत्युभोज का आयोजन किया गया। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, इसलिए वे परंपरा के अनुसार घी के मालपुए नहीं बनवा सके। उन्होंने केवल सादा भोजन कराया। इस बात से समाज के एक दर्जन से अधिक पंच इस कदर नाराज हुए कि उन्होंने अगले ही दिन 18 जून को फरमान सुनाकर इस परिवार सहित कुल 43 समर्थक परिवारों को समाज से बाहर कर दिया।

जीना हुआ दूभर, बच्चे भूखे सोने को मजबूर

पीड़ितों के अनुसार, बहिष्कार की मार झेल रहे परिवारों का जीना मुश्किल हो गया है। गांव के दुकानदार उन्हें राशन का सामान नहीं दे रहे हैं। खेत मालिक उन्हें मजदूरी पर नहीं रख रहे हैं। हद तो यह है कि इन परिवारों को गांव के सार्वजनिक कुएं से पानी तक भरने नहीं दिया जा रहा है। राशन न मिलने के कारण घरों में बच्चे भूखे सो रहे हैं।

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शादी-ब्याह और रिश्तों पर भी पहरा

इस फरमान का असर परिवारों के सामाजिक रिश्तों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पीड़ित गोपाल बताते हैं- मेरी बुआ की लड़की की 20 जून को शादी थी। पंचों के डर से मैं शादी में नहीं गया। फरमान है कि यदि कोई जाएगा तो उसे 11 हजार रुपए और पूरे समाज को सामूहिक भोजन (जिम) का दंड देना होगा। अन्य पीड़ित भोगीलाल ने बताया- मेरे भाई दिनेश की 24 जून को शादी थी। ननिहाल वालों ने दंड और मालपुए की मांग के डर से पीले चावल (निमंत्रण) लेने से ही इनकार कर दिया। इसके चलते शादी में कोई शामिल नहीं हुआ।

पंचों का तुगलकी फरमान, पीड़ितों की जुबानी….

वहीं तेजाराम ने बताया कि पंचों ने कहा कि हमने सादा भोजन खिलाकर समाज की नाक कटा दी। अब गांव में हमसे कोई बात नहीं करता। कुएं से पानी नहीं लेने दे रहे। वहीं गोपाल का कहना है कि पंचों के फरमान का ऐसा डर है कि मैं बुआ की लड़की की शादी तक में नहीं गया। इधर, भोगीलाल बताते है कि उनके भाई की शादी में कोई रिश्तेदार नहीं आया। ननिहाल वालों ने डर से पीले चावल (निमंत्रण) लेने से ही इनकार कर दिया। वहीं एक महिला ने कहा- हमारी बहू-बेटियों से गांव में कोई बोलता तक नहीं। घी के मालपुआ नहीं बनाए तो क्या हम इंसान नहीं रहे? ये कैसा इंसाफ है?

थाने में सुनवाई नहीं, अब कलेक्टर से गुहार

पीड़ितों ने 20 जून को बरलूट थाने में नामजद रिपोर्ट दी थी। आरोप है कि पुलिस ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इससे परेशान होकर गुरुवार को सभी 43 परिवारों के लोग सिरोही कलेक्ट्रेट पहुंचे और जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर न्याय की गुहार लगाई। उधर, बरलूट थाने के जांच अधिकारी रमेश कुमार ने कहा- परिवाद हमारे पास आया है। जांच चल रही है। यह मामला कोई पुरानी रंजिश का लग रहा है।

क्या कहता है कानून

कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी व्यक्ति या परिवार का सामाजिक बहिष्कार करना पूरी तरह गैर-कानूनी है। एडवोकेट महेंद्र सिंह ने बताया कि राजस्थान सामाजिक बहिष्कार निषेध अधिनियम, 2019 के तहत इस तरह का फरमान जारी करना अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर सात साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। उनका कहना है कि पुलिस को इस मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।

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