रमज़ान इनाम ओ इकराम का महीना है
रमज़ान इस्लामी कैलेंडर के अनुसार नौवां महीना है जिसमें रोजे रखे जाते हैं। अरबी भाषा में “रमज़ान” का अर्थ होता है “जलाना” या “खाक में मिलाना” यानी यह महीना इंसान के गुनाहों को मिटा देता है। इस महीने में अल्लाह की तरफ से बंदों पर रहमत और बरकत की बारिश होती है। हदीस में बताया गया है कि जो शख्स पूरे इमान और शरई हुक्मों के मुताबिक इस महीने को बिताएगा, वह बड़ा सवाब पाएगा और अल्लाह की खास रहमतों से नवाजा जाएगा। इस वजह से हर मुसलमान को चाहिए कि वह पूरी तवज्जो के साथ रोजे रखे और इस महीने में किसी भी तरह की लापरवाही न करे। रमज़ान का महीना बहारों का महीना है, यह सब्र और शुक्र का महीना है। इस महीने को इनाम और इकराम का महीना कहा गया है। यह तक़वा और नफ्स की तरबियत का महीना है। यह उन गुनहगारों के लिए बख्शिश का मौका है जो अपनी गलतियों से तौबा करना चाहते हैं। यह इंसान को भटके हुए रास्ते से निकालकर सही राह पर लाने का महीना है। बदअमाली और गुनाहों से बचने का महीना है। यह महीना इत्तेहाद और इत्तेफाक का पैगाम देता है, इसे इंसानियत, शरीफी और भाईचारे का महीना कहा गया है। इससे बड़ी बात और क्या होगी कि अल्लाह ने इस महीने को अपना महीना करार दिया है।
रमज़ान की खास बात यह भी है कि इस महीने में शैतान और गुनाह की तरफ बुलाने वाले जिन्नों को कैद कर दिया जाता है। जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। अल्लाह अपने बंदों पर रहमत फरमाता है और बहुत से लोगों को जहन्नम से निजात देता है। यही वह महीना है जिसमें कुरआन नाजिल किया गया, जो इंसानियत के लिए रहनुमाई और रोशनी का सरचश्मा है। रमज़ान और कुरआन का गहरा रिश्ता है। इस महीने में रोजेदार कुरआन की तिलावत करता है, रात को तरावीह की नमाज अदा करता है और सजदे में गिरकर अल्लाह की इबादत करता है। यह सब देखकर अल्लाह अपने फरिश्तों से फख्र के साथ कहता है कि देखो, मेरा बंदा कैसे मेरी रहमत की तरफ दौड़ रहा है।
रमज़ान का महीना इस वजह से भी खास है कि इसी महीने में तमाम आसमानी किताबें नाजिल हुईं। हजरत मूसा अ.स. को तौरात, हजरत ईसा अ.स. को इंजील, हजरत दाऊद अ.स. को ज़बूर और हमारे प्यारे नबी हजरत मोहम्मद स.अ.व. को कुरआन इसी महीने में अता किया गया। कुरआन की वजह से इंसानियत को अंधकार से रोशनी मिली, इंसान को हिदायत मिली, इस्लाम को ताकत मिली और काफिरों को शिकस्त मिली।
रमज़ान मुसलमानों के लिए साल का सबसे बड़ा और मुबारक महीना है। इस वजह से हर मुसलमान को चाहिए कि वह पूरे दिल से इस महीने की कद्र करे, रोजे रखे, गुनाहों से बचे, किसी को तकलीफ न दे, किसी से बदतमीजी न करे, वादाखिलाफी न करे और हर बुरी बात से खुद को दूर रखे। रोजेदार की शान यह होनी चाहिए कि वह अपनी जबान को गीबत, हसद, गुस्से, लालच और हर तरह की गंदी बातों से बचाए। अगर उसे कोई गुस्सा दिलाए तो वह सब्र से काम ले और हमेशा नर्मी और शराफत से पेश आए।
रोजे में भूख और प्यास सहनी पड़ती है, बहुत सी चीजों से परहेज करना पड़ता है। लेकिन अगर कोई सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए या आदत के तौर पर रोजे रखता है तो उसका असली सवाब नहीं मिलेगा। हदीस में आया है कि जो शख्स ईमान और अल्लाह के इनाम की उम्मीद के साथ रोजा रखता है, उसके पिछले सारे गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। इसलिए हमें पूरे दिल से इस महीने का एहतराम करना चाहिए। इस महीने में अल्लाह के खजाने से इतनी रहमतें बरसती हैं कि मांगने वाले के हाथ थक सकते हैं लेकिन अल्लाह का इनाम कभी खत्म नहीं होता। अगर कोई इस महीने की कद्र न करे, इसकी पवित्रता को न समझे या यह सोचे कि रोजा सिर्फ गरीबों की इबादत है, तो उसके लिए इससे बड़ी बदनसीबी और कोई नहीं हो सकती। हजरत शेख अब्दुल कादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि “रमज़ान गुनाहों से पाक होने का महीना है, यह वफादारों का महीना है, यह अल्लाह को याद करने वालों और सब्र करने वालों का महीना है। अगर यह महीना भी तेरे दिल को सही राह पर न लाए, गुनाहों से न बचाए, तो फिर और क्या चीज तुझे रोक सकती है?” इस महीने में मोमिनों के दिल रोशनी से भर जाते हैं और अल्लाह का जिक्र उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। यही वह महीना है जिसमें अल्लाह की रहमत हर तरफ फैल जाती है, फरिश्ते जन्नत के दरवाजे खोल देते हैं और एक आवाज लगती है, “ऐ भलाई चाहने वालों! आगे बढ़ो और ऐ बुराई करने वालों! रुक जाओ।”
इसलिए हमें चाहिए कि हम इस महीने का पूरा एहतराम करें, रोजे रखें, नमाज पढ़ें, कुरआन की तिलावत करें, अल्लाह से दुआ करें और अपनी जिंदगी को नेक अमल से भर लें ताकि यह महीना हमारे लिए सवाब और रहमत का जरिया बन जाए।
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