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ग़ज़ल

Jaipur

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सफ़र में जब सुकूते शाम आया।

मुसाफ़िर को बड़ा आराम आया।।

 

न वो आया न कुछ पैग़ाम आया।

तड़पना दिल का फिर किस काम आया।।

 

वही महफ़िल में रक़्से-ज़िंदगी है।

वही गर्दिश में अपना जाम आया।।

 

चिराग़ों को सियासत ने बुझाया।

मगर फिर भी हवा का नाम आया।।

 

बहुत ताक़त थी जिसके बालो-पर में।

परिंदा वो भी जे़रे-दाम आया।।

 

कोई बुत दिल में आकर बस गया क्या।

लबों पर क्यूँ ख़ुदा का नाम आया।।

 

ख़िरद हर गाम पर भटका रही थी।

जुनू का रास्ता ही काम आया।।

 

निकलना था हमें जन्नत से “अनवर”।

मगर आदम पे ये इल्ज़ाम आया।।

 

शकूर अनवर, कोटा। 

9460851271

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