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किस की क्या मजबूरी थी

Jaipur

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दिल ने पहले बहुत समझाया था  दिल को

झूठे  ही   उसने   बहलाया  था   दिल   को

झरना  झरना  फूट  पड़ा  था  ऐहसानों का

रात को  तुमने जब  सहलाया था  दिल को

ख़्वाब  में  ना   जाने  कितनी  परछाई  थी

कितने जतन थे कोई ना भाया था दिल को

मेरे  मुक़ाबिल  तब  भी  तुम  तो  ओछे  थे

जब  मैंने  खुद  से  ठुकराया  था  दिल  को

जान  सका ना  किसकी  क्या  मजबूरी थी

ख़ून   से  मेरे  जब  नहलाया  था  दिल  को

नाच  उठे   थे   मोर   बहुत   से   आंगन  में

उसने  जब  इक  गीत सुनाया  था दिल को

दरवाज़ो   पर   ताला    लगाने   वाले   सुन

ख़्वाब  कभी क्यूं  दिखलाया  था  दिल  को

फ़ज़लुर्रहमान

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