ग़ज़ल
क्या जानो अब हद से गुजरना सीख लिया
हमने तुमसे प्यार में लड़ना सीख लिया
बात मेरी जां वादों की क्यों करते हो
वादों ने वादों से बदलना सीख लिया
सपनों की दुनिया भी आखिर दुनियां है
सपनों ने अखबार में छपना सीख लिया
ज़ुल्म दबाने से भी दब ना पाएगा
मुर्दों ने भी उठ कर चलना सीख लिया
आओ ज़रा कुदरत से भी पूछा जाए
इंसानों ने क्या – क्या करना सीख लिया
उस्तादों की ज़ात से शिकवा कौन करे
ज़ात ने धन – दौलत को भरना सीख लिया
फ़ज़लुर्रहमान
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