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घर छोड़ा, गांव बदला…नदी पार कर दूसरी जगह रहा परिवार; 14 साल बाद हाथी ने फिर बरपाया कहर

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घर छोड़ा, गांव बदला…नदी पार कर दूसरी जगह रहा परिवार; 14 साल बाद हाथी ने फिर बरपाया कहर

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नई दिल्ली। हाथी को दुनिया के सबसे बुद्धिमान और संवेदनशील जानवरों में गिना जाता है। उसकी याददाश्त इतनी तेज मानी जाती है कि वर्षों पुराने रास्ते, पानी के स्रोत और कई घटनाएं भी वह याद रख सकता है। लेकिन नेपाल से सामने आई एक घटना ने लोगों को हैरान कर दिया है। यहां ‘धुरबे’ नाम के एक जंगली हाथी ने घर में घुसकर एक ही परिवार के दो लोगों की जान ले ली। हैरानी की बात यह है कि यही हाथी करीब 14 साल पहले भी इसी परिवार के दो लोगों की जान ले चुका है। तब से परिवार ने जगह बदली, घर बदला और नदी पार करके दूर आ गया, ताकि हाथी न आ सके। लेकिन हाथी ने पीछा नहीं छोड़ा। यह घटना नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान के पास स्थित जगतपुर इलाके की है। इस मामले के सामने आने के बाद एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि क्या हाथी इंसानों को लंबे समय तक पहचान कर याद रख सकते हैं या यह केवल एक संयोग है।

चितवन राष्ट्रीय उद्यान के सूचना और संरक्षण अधिकारी अबिनाश थापा ने खुद इसकी पुष्टि की है। काठमांडू पोस्ट से बातचीत में उन्होंने बताया कि हाथी पर नजर रखने के लिए हमने ट्रैकिंग कॉलर लगाई थी। घटना के वक्त उस हाथी की लोकेशन घर के आसपास की ही थी। उनके मुताबिक इन दो नई मौतों के साथ अब तक यही हाथी कुल 25 लोगों को मौत के घाट उतार चुका है। इन पीड़ितों में दो उद्यान कर्मी भी शामिल हैं जो पार्क में सिक्योरिटी का काम संभालते थे।

14 साल पहले भी इसी परिवार पर टूटा था कहर

पीड़ित परिवार के सदस्य शनिचारा ने स्थानीय अखबार काठमांडू पोस्ट को बताया कि 16 दिसंबर 2012 को उनका परिवार बोते माडी इलाके में रहता था। उसी दौरान धुरबे नाम के जंगली हाथी ने उनके पिता बुधिराम और मां झरली पर हमला कर उन्हें कुचल दिया था। उस घटना के बाद परिवार पूरी तरह टूट गया। अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए शनिचारा ने पुराना घर छोड़ दिया। उन्होंने रेउ और राप्ती नदी पार कर काफी दूर जगतपुर में नया घर बना लिया। उन्हें विश्वास था कि हाथी अब वहां तक नहीं पहुंच पाएगा, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। दो दिन पहले ही उसने अचानक घर पर हमला कर दिया और उनकी बहू आशिका और 4 साल के पोते भरत को मार दिया। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।

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हाथी के बारे में कहा जाता है कि वह अपने नकारात्मक अनुभवों को याद रखते हैं। अफ्रीकी हाथियों पर लंबा रिसर्च करने वाले शोधकर्ता डॉ. जॉयस पूल और सिंथिया मॉस ने दावा किया था कि हाथी उन क्षेत्रों और परिस्थितियों को लंबे समय तक याद रखते हैं जहां उन्हें किसी तरह का खतरा, शिकार या हिंसा का सामना करना पड़ा हो। उदाहरण के तौर पर इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर किसी गांव में हाथियों पर पत्थर फेंके गए, पटाखे फोड़े गए हों तो हाथी उस स्थान को पहचान सकते हैं और अगली बार जब वह वहां पर होंगे तो ज्यादा आक्रामक हो सकते हैं। वैज्ञानिक इसे सीखा हुआ व्यवहार या रिस्क मेमोरी कहते हैं।

हाथियों की याददाश्त होती है बेहद मजबूत

हाथियों की याददाश्त बहुत अच्छी होती है। शोधकर्ता डॉ. जॉयस पूल के मुताबिक हाथियों के झुंड की बुजुर्ग मादा वर्षों पुराने जलस्रोतों को याद रख सकती है। वे अलग अलग मानव समूहों के बीच अंतर कर सकते हैं और सूखे के वर्षों बाद भी वे पानी और भोजन वाले रास्ते पहचान लेते हैं। काठमांडू पोस्ट से बातचीत में गैलाघारी बफर जोन उपभोक्ता समिति के अध्यक्ष लाल बहादुर ने जो कहा वह भी इसकी पुटि करता है। उनका कहना है कि पिछले नौ-दस दिन से वह जंगल के आसपास देखा गया था और मानव बस्तियों में घुसने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने कहा कि धुरबे हाथी हर साल गांव की ओर लौटता है।

इंसानी बस्तियों पर हमला क्यों करते हैं हाथी?

हाथियों के इंसानी बस्तियों की तरफ आने की वजह से जंगलों का खत्म होना है, हालांकि नेपाल में ये कारण नहीं है। यहां भोजन एक कारण हो सकती है। दरअसल धान मक्का, गन्ना और केले की फसलें हाथियों को आकर्षित करती हैं। कई रिसर्च में ये माना गया गया है कि जंगल में मिलने वाले खाने की बजाय हाथी खेतों में मिलने वाले भोजन को ज्यादा पसंद करते हैं, इसीलिए वे अक्सर हमला कर देते हैं। भरतपुर महानगर पालिका-23 के बेलहत्था के 72 साल के केशव लामिछाने 1985 से यहां रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि गर्मी और सर्दी देानों समय जब फसल कटाई का वक्त होता है धुरबे यहां आता है। पिछले साल भी उसने खेतों पर हमला कर दिया था और चावल की बोरी को उठाकर ले गया था।

धुरबे को गोली भी मार चुके हैं वनकर्मी, मान लिया था मरा हुआ

धुरबे के लगातार हमलों के बाद वर्ष 2012 में वन विभाग ने उसे गोली भी मारी थी। अधिकारी अबिनाश थापा के अनुसार गोली लगने के बाद हाथी जंगल के अंदर भाग गया। उसकी तलाश में करीब 16 लाख रुपये खर्च किए गए, लेकिन वह नहीं मिला। काफी समय तक खोजबीन के बाद अधिकारियों ने मान लिया था कि उसकी मौत हो चुकी है। लेकिन वर्ष 2016 की सर्दियों में धुरबे अचानक फिर दिखाई दिया। इसके बाद उसने अपना इलाका और बढ़ा लिया। आखिरकार वर्ष 2023 में उसे ट्रैकिंग कॉलर पहनाया गया, जिससे उसकी हर घंटे लोकेशन पर नजर रखी जाती है।

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