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विकसित भारत बनाम अंधकार का युग

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पिछले कुछ वर्षों से भारत को एक विकसित देश के रूप में अति महिमामण्डित किया जा रहा है। बार-बार दोहराया जा रहा है कि जैसा विकास पिछले दस ग्यारह वर्षों में हुआ, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। तकनीक, ज्ञान-विज्ञान, अर्थ, समाज, राजनीति, कूटनीति, विदेश नीति आदि में जबर्दस्त बदलाव आया है और भारत विश्व में सर्वेसर्वा बनने जा रहा है। आम जनता इस प्रकार उल्लासित है मानों कोई खजाना मिल गया हो। विकास करने वालों का थोड़ा सा भी विरोध करते हैं तो उनका पक्ष लेने वाले कई खड़े हो जाते हैं। सब जगह विकसित भारत-विकसित भारत की ही गूंज सुनाई दे रही है। लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। विकसित भारत की आड़ में क्या से क्या होता जा रहा है, यह महसूस भी किया जा रहा है और दिख भी रहा है, लेकिन इसका विरोध नहीं हो पा रहा है। जो विरोध हो रहा है, वह नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रहा है। सत्ता की ओर से धर्म के नाम पर बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनवाई जा रही हैं। यह वो धन है जो जनता कर के रूप में, जिसकी सीमा 30 प्रतिशत तक है। चुका रही है। गली-मोहल्लों में सड़कों के हाल खराब हैं, लेकिन मंदिर आलीशान बनवाये जा रहे हैं। मंदिरों की तो बाढ़ सी आई हुई है। जहाँ भी जगह देखी, जमीन रोकी और मंदिर बनना शुरु हो जाता है। कई बार तो बीचों-बीच रास्ते में मंदिर बन जाते हैं। कोई रोक-टोक करने वाला नहीं। ज्ञान-विज्ञान का हाल यह है कि देश की कुल आबादी की एक तिहाई कुम्भ स्नान में व्यस्त है, जिसका आयोजन सरकार द्वारा किया जा रहा है। इस आयोजन पर 6382 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। यह खर्चा राममंदिर पर खर्चे (1800 करोड़) का साढे तीन गुना, स्टेच्यू ऑफ यूनिटी पर खर्चे (2989 करोड़) का करीब सवा दो गुना और नये संसद भवन पर खर्च (1200 करोड़) का 5।31 गुने से अधिक है (राजस्थान पत्रिका 13 जनवरी 2025)1 समझदार जनता अंदाज लगा सकती है कि इतनी धनराशि से कितने स्कूल-कॉलेज, अस्पताल और कारखाने खोले जा सकते थे !! और नही तो सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी पूरी की जा सकती थी और अच्छे पेशाबघर और शौचालय बनवाये जा सकते थे। आज हालात यह है कि सरकारी विद्यालयों में कोई भी जागरुक इंसान अपने बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहता है। अध्यापक हैं तो भवन नहीं, भवन हैं तो अध्यापक नहीं। अध्यापक अधिकतर बेकार के कामों में उलझे रहते हैं। मजबूरन लोग अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ाते हैं, और इसके बाद ट्यूशन भी भेजते हैं। अस्पतालों में आयुष्मान भारत और आरजीएचएस योजनाएं हैं, लेकिन कितनी ही दवाई-गोलियां और जांचें खुद के खर्चे से करवानी पड़ी हैं। इसी प्रकार सन 2004 के बाद नियुक्त कर्मचारियों के लिए कोई पेंशन योजना नहीं है, जबकि जो व्यक्ति जितनी बार राजनेता (एमपी, एमएलए) बनता है। उसे उतनी ही बार पेंशन मिल रही है। क्या विकसित भारत की यही पहचान है कि सारी जिन्दगी सरकार की सेवा में खपा देने के बाद भी व्यक्ति अपने बुढ़ापे के लिए चिन्तित रहे और जो व्यक्ति मात्र कुछ समय ही राजनेता चुना जाये, वह सारी जिन्दगी पेंशन पाये। रोज ऐसे-ऐसे नये अविष्कार सामने आ रहे हैं, जिन पर विश्वास करना नामुमकिन है। लेकिन जब ऐसी बातें सरकारी अधिकारी या नेता करते हैं तो वास्तव में भयावह लगता है कि देश किस दिशा में जा रहा है? मामला हवाई जहाज के अविष्कार को लेकर है। इसी प्रकार पाठ्यक्रमों में धर्म के हिसाब से परिवर्तन किया जा रहा है और अनेकानेक राष्ट्रीय धरोहरों, नस्लों, स्थानों भवनों और रास्तों तक के नाम बदले जा रहे हैं या हटाये जा रहे हैं। रसायन विज्ञान की रीढ़ की हड्डी कही जाने वाली आवर्तसारणी पाठ्यक्रम से हटा दी गई है, मानों पंचतत्व ही अब इसका स्थान लेंगे !! ये लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी देश का साहित्य और इतिहास बदल देने का क्या प्रभाव पड़ता है? हो सकता है आने वाले समय में घरों और पुस्तकालयों से खोज-खोज कर पहले का लिखा इतिहास और साहित्य निकाला जाये और उसकी होली जलाई जाये !! देश की जनसंख्या नियन्त्रण के लिए दिए गये नारे ‘हम दो। हमारे दो अब अतीत की बातें हो चुकी हैं और अब जातीय पंचायते सरेआम अपने समाज के लोगों से अपील कर रही हैं कि कम से कम चार-चार संताने पैदा करो। (जैसा कि दिनांक 13।01।2025 के राजस्थान पत्रिका में मध्यप्रदेश सरकार के परशुराम कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष पण्डित विष्णु राजोरिया का बयान है- ब्राह्मण युगल चार संताने पैदा करे तो मिलेंगे एक लाख रुपये और समाज के लोग कम से कम चार संतान पैदा करें, अन्यथा विधर्मी लोग देश पर कब्जा कर लेंगे”)। इसी प्रकार 13।01।2025 के ही दैनिक भास्कर में अजमेर में आयोजित सिंधी संतों की धर्म संसद ने प्रस्ताव पारित किया है कि एक संतान देश के लिए, एक संतान धर्म के लिए और दो संतान पविार के लिए होना चाहिए। इस प्रकार सिंधी संतों की धर्म संसद ने भी चार संतान पैदा करने का प्रस्ताव पारित किया है। इन बयानों पर सरकार की चुप्पी इनको मौन समर्थन देने जैसा है। क्या इस प्रकार के प्रस्ताव पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा जनसंख्या नियन्त्रण बाबत किए गए प्रयासों पर पानी फेरते नजर नहीं आते? इसका मतलब पूर्व में किए गए सारे प्रयास गलत थे ? कुम्भ में स्नान करने पर मिलने वाले फल के बारे में जगदगुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द के अनुसार “संगम में डुबकी लगाने से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट होते हैं। पुण्य कर्म करने से सुख मिलते हैं और पाप कर्म करने से दुख (दैनिक भास्कर 13।01।2025)।

अर्थात् संगम में डुबकी लगाने वाले व्यक्ति को बाद में किसी भी तरह के दुख नहीं होने चाहिए ! देश- विदेश के 45 करोड़ लोग संगम में स्नान करेंगे या कर चुके। क्या वे सब दुखों से मुक्त हो गये या हो जायेंगे? और जो जलीय जीव-जन्तु हमेशा ही संगम के पानी में रहते हैं। उनके बारे में स्वामी जी का क्या ख्याल है? वे तो पाप-मुक्त हो ही गये होंगे।  ऐसे में संत कबीरदास जी के क्रान्तिकारी दोहे याद आते हैं- पूरे साल करते रहे, एक एक करके पाप। एक दिन गंगा नहाय के, करवा लेते माफ। कहे कबीर समझाये, वाह खूब रे पापी। आप ही करता पाप और आप ही मानता माफी।

“नहाए-धोए क्या भला, जो मन का मैल न जाय, मीन सदा जल में रहे, धोए बास न जाए।

मल मल धोए शरीर को धोए न मन का मैल, नहाए गंगा गोमती, रहे बैल के बैल।”

लेकिन सदियों पूर्व कहे गये ये दोहे कोई नहीं मानता। सबको अगला जन्म सुधारने और स्वर्ग में सीट बुक कराने की पड़ी है। इस बार कुम्भ नहाने वालों में अनेक ऐसे भी हैं जिन्होनें इसके पहले का कुम्भ भी नहाया था। जब जन्म-जन्मान्तरों के पाप तब ही नष्ट हो गये थे तो इस बार नहाने का क्या औचित्य? इसके अलावा कुम्भ में जाते समय, नहाते समय और वापस आते समय कई लोग दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते है।  तब कुम्भ की महिमा काम क्यों नहीं आती? वास्तव में यह सब काल्पनिक ही है, लेकिन समय-समय पर राजसत्ता, बहुसंख्यक समाज और शासन-प्रशासन द्वारा आश्रय प्राप्त होने के कारण विरोध के स्वर नहीं उठते हैं। विरोधियों को नास्तिक घोषित कर दिया जाता है। देश के नागरिकों को ही समझना होगा कि वे किस प्रकार का विकसित भारत चाहते है? आकण्ठ धर्म और ईश्वर में डूबा भारत या चहुँ और तरक्की करता भारत जिसके नागरिक सुखी सम्पन्न और आपसी सौहार्द से रहते हो।

डॉ. श्याम सुन्दर बैरवा, भीलवाड़ा

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