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जयपुर

18वीं सदी के क्रांतिकारी फ़कीर

यह विशेष आलेख हज़रत मजनू शाह मलंग मदारी के शहादत दिवस (26 जनवरी 1787) पर केंद्रित है। हरियाणा के मेवात में जन्मे इस सूफी फकीर ने 18वीं सदी में बंगाल से लेकर उत्तर प्रदेश तक अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ रखा था। अंग्रेजों ने इसे 'पागलपंथी' आंदोलन कहा, लेकिन यह ईस्ट इंडिया कंपनी के शोषण के खिलाफ एक मजबूत विद्रोह था। लेख में इस बात पर चिंता जताई गई… Read More

दौलत खुदा से गाफ़िल कर देती है

जयपुर

वरिष्ठ अधिवक्ता हबीबुल्लाह का यह लेख इस्लाम में दौलत और सरमायादारी के प्रति दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। लेख में बुखारी शरीफ की एक हदीस का हवाला दिया गया है, जिसमें रसूले मकबूल (स.अ.व.) ने अपने सहाबा से कहा था कि उन्हें उनकी गरीबी का डर नहीं, बल्कि इस बात का डर है कि वे मालदार होकर दुनिया की मोहब्बत में न फंस जाएं। लेखक के अनुसार, दौलत इंसान को…

संवैधानिक मूल्य: गणतंत्र की आत्मा और नागरिक दायित्व — 77वें गणतंत्र दिवस पर विशेष

जयपुर

77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार बाबूलाल नागा का यह लेख संवैधानिक मूल्यों की महत्ता पर प्रकाश डालता है। लेखक का कहना है कि संविधान केवल शासन चलाने की किताब नहीं, बल्कि एक जीवंत दर्शन है। इसमें निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुता जैसे मूल्य हमें अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी याद दिलाते हैं। लेख में जोर दिया गया है कि सच्चा गणतंत्र तब बनेगा जब नागरिक…

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अरुजी समरकंदी: इस्लामिक स्वर्ण युग के ‘सांस्कृतिक राजदूत’;

जयपुर

निजामी अरुजी समरकंदी 12वीं शताब्दी के एक महान फारसी लेखक थे, जिन्हें मध्य-एशिया का 'सांस्कृतिक राजदूत' माना जाता है। उनकी पुस्तक 'चहार मकाला' ने इब्न सिना, उमर खय्याम और अल-बिरूनी जैसे विद्वानों के लुप्त हो चुके इतिहास को बचाया। इस लेख में पढ़ें कि कैसे उस दौर में विज्ञान, दरबार और साहित्य का अद्भुत संगम था और कैसे इब्न सिना ने 'क्वारंटाइन' की शुरुआत की।

राष्ट्रीय युवा दिवस:

जयपुर

हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद की जयंती को 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनाया जाता है। स्वामी जी का मानना था कि युवा देश की रीढ़ हैं और चरित्र निर्माण ही शिक्षा का असली उद्देश्य है। आज जब भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, तो उनके विचार बेरोजगारी, मानसिक तनाव और डिजिटल भटकाव जैसी चुनौतियों से लड़ने में मदद कर सकते हैं। यह दिन युवाओं को…

मौलाना मोहम्मद अली जौहर: कलम, क़ुर्बानी और क़ौमी एकता की ज़िंदा मिसाल

जयपुर

यह लेख भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर के जीवन और संघर्षों पर प्रकाश डालता है। इसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने ऑक्सफोर्ड से पढ़ने के बावजूद अंग्रेजों के खिलाफ 'कॉमरेड' और 'हमदर्द' अखबारों के जरिए विद्रोह का बिगुल फूंका। लेख में खिलाफत आंदोलन में उनकी भूमिका और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उनके प्रयासों का वर्णन है। सबसे महत्वपूर्ण, इसमें उस वाकये का जिक्र है…

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ज़िगर मुरादाबादी और नाते रसूल (स.अ.व.):

जयपुर

यह लेख प्रसिद्ध उर्दू शायर ज़िगर मुरादाबादी के जीवन की एक मर्मस्पर्शी घटना पर आधारित है। रशीद अहमद सिद्दीकी के अनुसार ज़िगर साहब शराब के आदी थे, लेकिन वे हमेशा अदब के दायरे में रहे। लेख में उस वाकये का जिक्र है जब उन्हें एक नातिया मुशायरे का निमंत्रण मिला। अपनी 'रिंद' (शराबी) छवि और पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.) के प्रति प्रेम के बीच द्वंद्व महसूस करते हुए, उन्होंने शराब से…

कुरान: दया, इन्साफ और मोहब्बत की शिक्षा का स्रोत

जयपुर

यह लेख भारतीय मुसलमानों के समक्ष मौजूद सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों के संदर्भ में कुरान की शिक्षाओं के महत्व पर प्रकाश डालता है। लेख में बताया गया है कि कैसे दया (रहमा), न्याय (अदल) और करुणा (एहसान) केवल धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति हैं। लेखक ने जोर दिया है कि शिक्षा की कमी और आंतरिक बिखराव को दूर करके ही समुदाय आगे बढ़ सकता है। कुरान के…

शहीद अशफाक उल्ला खान:

जयपुर

यह लेख भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी शहीद अशफाक उल्ला खान के जीवन और बलिदान पर आधारित है। इसमें उनके प्रारंभिक जीवन, शाहजहांपुर से शुरू हुए उनके सफर, और राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उनकी गहरी दोस्ती का वर्णन है। लेख का मुख्य हिस्सा 1925 के ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन (डकैती) पर केंद्रित है, जिसके कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार ने 27 वर्ष की अल्पायु में 19 दिसंबर 1927 को फांसी…

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मिर्ज़ा ग़ालिब (1797-1869):

नई दिल्ली

नई दिल्ली/आगरा: मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान उर्फ 'मिर्ज़ा ग़ालिब' (27 दिसंबर 1797 - 15 फ़रवरी 1869) उर्दू और फ़ारसी के महानतम शायर थे। आगरा के एक सैन्य परिवार में जन्मे ग़ालिब ने 13 साल की उम्र में शादी के बाद दिल्ली को अपना घर बनाया। वे अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि थे और उन्हें 'दबीर-उल-मुल्क' और 'नज़्म-उद-दौला' जैसे खिताब मिले। ग़ालिब अपनी अनूठी शैली (अंदाज़-ए-बयाँ) और…

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