नौनिहालों को इतिहास की जगह मिथक पढ़ाना भयावह
– देश का वास्तविक इतिहास मिटाने की साज़िश
किसी भी देश का इतिहास उसके भूतकाल का लेखा-जोखा और धरोहर होता है। यह किसी के लिए अच्छा तो किसी के लिए कष्टदायक हो सकता है। इतिहास में अच्छी और बुरी, दोनों ही प्रकार की घटनाएँ होती हैं। अच्छी घटनाएँ प्रेरणा देती हैं तो बुरी घटनाएँ सबक। लेकिन इतिहास से किसी भी तरह का सबक लेने के बजाय उसे तोड़-मरोड़ कर पेश करना, अतिशयोक्तिपूर्ण बनाना, काल्पनिक घटनाओं और मिथकों का समावेश करना, इसे समाप्त करने जैसा दुष्कृत्य है। इससे इतिहास की प्रमाणिकता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है और विद्वान उसे प्रक्षिप्त समझकर शंकापूर्ण दृष्टि से देखने लग जाते हैं। कुछ लोग दशकों से देश के इतिहास को मनमाना रूप देने में लगे हुए हैं, ताकि इस देश के हिन्दुओं के उजले पक्ष को अधिकाधिक दिखाया जा सके और स्याह पक्ष को छिपाया जा सके। साथ ही विदेशी आक्रमणकारियों (तुर्क, मुस्लिम, मुगल, अंग्रेज़ आदि) के छोटे से छोटे अत्याचार और अनाचार का तिल का ताड़ बनाना, लेकिन उनके किए गए बड़े-बड़े महान कार्यों को भी राई के बराबर बनाना, इनका ही कार्य है। भारत में धर्म से जुड़े हज़ारों मिथक हैं, जिन्हें न विज्ञान की मान्यता है और न ही इतिहास की। उदाहरण के लिए – हनुमान जी का उड़ना, उनके द्वारा सूर्य को निगलना, शाम के समय उड़ना और रात भर में लंका से हिमालय आना और संजीवनी बूटी का पहाड़ लेकर वापस लंका जाना, रामसेतु का निर्माण, पुष्पक विमान, शेषनाग के सिर पर पृथ्वी का होना, युद्ध में राक्षसों के मायावी कारनामे, महाभारत में विचित्र तरीकों से कौरवों, पांडवों, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि का जन्म, समुद्र मंथन, राहु-केतु द्वारा सूर्य-चंद्रमा को निगलना आदि। ज्यों-ज्यों तथाकथित धार्मिक पुस्तकें पढ़ते जाते हैं, सच्चाई कम, मिथक अधिक मिलते हैं। सर्वाधिक असंभव बातें तो पुराणों में हैं, जिनके बारे में स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी कहा है। यह बड़े ही दुख और निराशा की बात है कि दस साल तक पूर्ण बहुमत से और वर्तमान में सहयोग से बहुमत पाकर राज करने वाली भाजपा सरकार को इतिहास से नहीं, बल्कि मिथकों से अधिक सरोकार है। देश की भावी पीढ़ियाँ इनका बनाया नवसृजित “इतिहास” पढ़कर क्या करेंगी, किसी को इससे कोई मतलब नहीं है।
सरकार कक्षा सात की पुस्तकों से मुग़ल काल और दिल्ली सल्तनत काल को हटा चुकी है। इनके स्थान पर भारतीय राजवंशों की जानकारी, पवित्र धार्मिक स्थलों, महाकुंभ, भारत और अन्य देशों में अन्य धर्मों के तीर्थ स्थलों की जानकारी, 12 ज्योतिर्लिंग, चार धाम यात्रा, शक्तिपीठों, नदियों के संगम, वन और सरकारी योजनाओं की जानकारी पढ़ाई जाएगी। भारतीय राजवंशों की जानकारी देने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन वे कब-कब किससे जीते और कब-कब किससे हारे, इसके स्थान पर क्या बताया जाएगा? क्या एक हाथ से ही ताली बजाई जाएगी? इसके अलावा सरकार द्वारा जनता को धर्म की जानकारी देना क्या वास्तविक मुद्दों से उसका ध्यान भटका कर धर्मजाल में उलझाना नहीं है? बाकी आगे जो कुछ है, वह इतिहास का हिस्सा न होकर शासन-प्रशासन का हिस्सा है, जिसे उचित स्थान पर दिया जाना चाहिए, न कि इतिहास के तौर पर। लगता है सरकार और सरकारी इतिहासकारों ने इतिहास को पेंसिल की लाइन समझ रखा है जिसे चाहे जब मिटा दें और चाहे जब, जैसी बनाना हो, बना दें! लेकिन पुस्तकों से इतिहास मिटा देने से इतिहास समाप्त नहीं हो जाता। इतिहास के जो जीवंत अवशेष हैं – इमारतें हैं, प्राचीन पुस्तकें हैं, म्यूज़ियम हैं, बर्तन-भांडे, औज़ार, हथियार, वस्त्र आदि हैं – उनका क्या करेंगे? क्या तुगलकाबाद, दिल्ली, आगरा और अन्य सैकड़ों स्थानों पर मुस्लिमों द्वारा बनवाए गए किलों, इमारतों और महलों पर भी सरकार बुलडोज़र चलाएगी?आज से बीस साल बाद यदि कोई व्यक्ति किसी विद्यार्थी से पूछे कि कुतुब मीनार, लाल क़िला, जामा मस्जिद, चारमीनार और विश्व-विरासत ताजमहल किस-किसने और कब बनवाए थे, तो विद्यार्थी के पास कोई जवाब नहीं होगा, क्योंकि उसने ये सब पढ़े ही नहीं होंगे। अतः देश के इतिहास में जो कुछ रह गया है या कम है, उसे शामिल करना तो उचित है, लेकिन द्वेषवश किसी कालखंड को पूरा का पूरा ही हटा देना, इतिहास को नष्ट करने जैसा है।
– डॉ. श्याम सुन्दर बैरवा, भीलवाड़ा
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