हज़रत इब्राहीम (अलै.) की आज़माइश और ईद-उल-अज़हा का त्योहार
ईद-उल-अज़हा, जिसे ‘क़ुरबानी की ईद’ या बकराईद भी कहा जाता है, मुसलमानों का तीन दिन का त्योहार है जो हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की अल्लाह के तरफ वफ़ादारी और रज़ा की याद में मनाया जाता है। यह त्योहार दुनियाभर के मुस्लिम परिवारों को एकजुट करता है। जिसमें दावत, तोहफ़ों का लेन-देन और इबादत शामिल होती है और मुसलमानों को क़ुरबानी के अहमियत को समझने का मौका देता है। ईद-उल-अज़हा हज के खत्म होने की भी निशानी है, जो इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है। यह हर उस मुसलमान पर फ़र्ज़ है जो जो जिस्मानी और माली एतबार से क़ाबिल हो और ज़िन्दगी में कम से कम एक बार हज कर सके। ईद-उल-अज़हा इस्लाम में दूसरा सबसे जरूरी अहम त्योहार है, जिसे हर साल अल्लाह की रहमत और बरकत हासिल करने के लिए मनाया जाता है।
हज़रत इब्राहीम की क़ुरबानी की कहानी
मुसलमानों का मानना है कि यह जब हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) और उनकी पत्नी हाजरा को बहुत सालों की दुआओं के बाद बेटे इस्माईल (अलैहिस्सलाम) अता हुआ। अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम की आज़माइश लेने के लिए उन्हें अपने प्यारे बेटे की क़ुरबानी देने को कहा वो बेटा जिसके लिए उन्होंने बरसों तक इंतज़ार किया था। हज़रत इब्राहीम ने अल्लाह की रज़ा में इतना यक़ीन और ईमान रखा कि उन्होंने इस आज़माइश में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई और अपने बेटे को क़ुरबान करने के लिए तैयार हो गए। उनके इस इखलास को देखकर अल्लाह ने उन्हें इनाम दिया और बेटे की जगह एक मेंढे की क़ुरबानी क़बूल कर ली।इस मोजज़ाना वाक़ये के ज़रिए मुसलमानों को सिखाया जाता है कि अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा रखें और हर इम्तिहान में सब्र करें। इसी वजह से मुसलमान हर साल इस दिन को “ईद-उल-अज़हा” के रूप में मनाते हैं, ताकि इस्लामी तारीख के इस पाक लम्हे को याद रखा जाए।
क़ुरबानी और रहमदिली का पैग़ाम
इस पाक दिन, हज़रत इब्राहीम की अल्लाह के लिए वफ़ादारी का एहतराम करने के लिए मुसलमान जानवर की क़ुरबानी करते हैं और उसका गोश्त परिवार, दोस्तों और ज़रूरतमंदों में तकसीम करते हैं। आमतौर पर बकरी, भेड़, भैंस की क़ुरबानी की जाती है।
हाल के सालों में पश्चिमी दुनिया में इस्लामी तरीक़े से जानवरों की क़ुरबानी को लेकर कुछ विवाद भी हुए हैं। हलाल क़ुरबानी को कुछ लोग अमानवीय बताते हैं। लेकिन इस्लामी हुक्म यह है कि जानवर को तकलीफ़ न दी जाए और उसे जल्दी से जल्दी और रहमदिली से ज़बह किया जाए। क़ुरबानी के वक़्त जानवर को क़िब्ले (मक्का) की ओर मोड़ा जाता है और एक तेज़ धार वाले चाकू से एक ही वार में उसका गला काटा जाता है – उस समय “बिस्मिल्लाह” (अल्लाह के नाम पर) कहा जाता है। यह इस बात का एहसास दिलाता है कि जिस जानवर की जान ली जा रही है, वह भी अल्लाह की मख़लूक़ है और उसका आदर ज़रूरी है। जानवर को दर्द बहुत थोड़ी देर के लिए होता है क्योंकि वह चंद सेकंडों में बेहोश हो जाता है। इस दिन का एक अहम हिस्सा यह भी है कि गरीबों और ज़रूरतमंदों को याद रखा जाए और उन्हें खैरात दी जाए। इससे आपसी भाईचारे को बढ़ावा मिलता है और मुसलमानों को शुक्रगुज़ारी और अल्लाह की नेमतों की क़द्र करना सिखाया जाता है।
ईद की नमाज़ और भाईचारा
मुसलमान ईद-उल-अज़हा की शुरुआत एक ख़ास नमाज़ से करते हैं जिसे “सलात-उल-ईद” कहते हैं। यह आमतौर पर एक बड़े जमात में अदा की जाती है। इसके बाद इमाम ख़ुत्बा देता है। यह नमाज़ फ़र्ज़ तो नहीं लेकिन इससे बहुत सवाब मिलता है और इससे मुस्लिम उम्मत में एकता और भाईचारा मज़बूत होता है। नमाज़ के बाद मुसलमान एक-दूसरे को “ईद मुबारक” कहकर मुबारकबाद देते हैं। बाक़ी का दिन दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ बिताया जाता है, साथ खाना खाना, मिठाइयाँ और तोहफ़े बाँटना यह सब ईद की रौनक़ का हिस्सा होता है।
सबक और रहमतों की बारिश
क़ुरबानी का गोश्त, हज की रिवायतों की तकमील, ईद की नमाज़ और भाईचारे का जश्न, ये सब मिलकर ईद-उल-अज़हा को इस्लाम का एक बेहद अहम त्योहार बनाते हैं। यह दिन ना सिर्फ़ मुसलमानों में अच्छाई और रहमत को बढ़ावा देता है, बल्कि क़ुरबानी और शुक्रगुज़ारी जैसे अहम सबक भी सिखाता है। यह पाक दिन मुसलमानों को अल्लाह से ढेरों रहमतें कमाने का एक शानदार मौक़ा देता है और यह बताता है कि ईमान और वफ़ादारी कैसी होनी चाहिए, जैसी हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की थी। ज़रूरतमंदों को क़ुरबानी का गोश्त बाँटना और खैरात देना मुसलमानों में मोहब्बत और भाईचारे को बढ़ाता है और उन्हें अल्लाह की दी हुई नेमतों का शुक्र अदा करना सिखाता है।
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