मौलाना लियाकत अली:- इलाहाबाद के एक महान क्रांतिकारी नेता
1857 में जब हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजो के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया तो उस वक्त बगावत की लपटें इलाहाबाद और उसके आसपास के इलाकों में पहुंच चुकी थी। इलाहाबाद में बगावत की आवाज वहां के पंडितों ने उठाई तथा इस जंग में कयादत के लिए मौलवी लियाकत अली को चुना गया। यह जंग लंबी तो नहीं चली पर अंग्रेजों में उनके नाम का खौफ इस कदर था कि उनके नाम से मैदान छोड़कर भागने लगते। महगांव (कौशांबी) में 17 जुलाई 1817 को लियाकत अली खान का जन्म हुआ था। लियाकत अली खान के चाचा ने बचपन में ही उन्हें गोद ले लिया था। मदरसे से इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार शिक्षा प्राप्त करने के बाद लियाकत अली पेश इमाम हो गए तथा मदरसे में पढ़ाने लगे। 1857 की क्रांति के समय सम्राट बहादुरशाह जफर ने उनको इलाहाबाद का गवर्नर घोषित किया था। बेगम हजरत महल समेत अन्य बड़े क्रांतिकारियों के वे संपर्क में थे। मौलाना लियाकत अली को जागीरदारों तथा आम जनता ने अंग्रेजों को बाहर भगाने में खूब सहयोग किया उनकी सेना में हिंदू, मुस्लिम, सिख सभी सैनिक थे। लियाकत अली व्यूह रचना में माहिर थे। 7 जून 1857 को पूरे इलाहाबाद शहर की अंग्रेजों से आजाद करवा दिया था। शहर को आजाद कराने के बाद 10 दिनों तक उनके साथ ही क्रांतिकारी तहसीलदार, नायब और कोतवाल भूमिका में रहे मौलवी लियाकत अली ने अंत तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन 17 जून को प्रतिकूल परिस्थितियों में युद्ध क्षेत्र छोड़ना पड़ा। कानपुर से भागकर लियाकत अली मुंबई में भेष बदलकर रहने लगे। उन पर ब्रिटिश सरकार ने 5000 रुपये का इनाम घोषित कर दिया। लगभग 14 वर्ष तक गुमनामी में रहे। इस क्रांतिवीर को सितंबर 1871 में मुंबई में एक मुखबिर ने पहचान लिया।और 1873 में उनको आजीवन कारावास की सजा सुनाई और अंडमान जेल भेज दिया गया, जहां 17 मई 1881 को बंदी रहते हुए उनकी मृत्यु हुई और उनको कालापानी में ही दफनाया गया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा का आज़ादी का झंडा फहराने वाले मौलवी लियाकत अली की तलवार व कुर्ते को इलाहाबाद संग्रहालय में जून 2021 को ससम्मान प्रदर्शित किया गया।
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