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हसरत मोहानी गंगा जमुनी तहजीब के महान इंकलाबी शायर

Jaipur

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बहुत सारे हिंदुस्तानी शायर ऐसे हुए हैं जिनकी कलम ने अपनी ताकत पर भारतीयों को अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने के लिए उत्साहित किया है, उन्हीं फेहरिस्त में इंकलाब जिंदाबाद का नारा देने वाले आजादी के सच्चे सिपाही मौलाना हसरत मोहानी जो मादरे वतन के लिए अंग्रेजो के खिलाफ हमेशा आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते रहे का प्रमुखता से आता है। 1 जनवरी 1875 को उन्नाव के मोहान गांव में जन्मे हसरत मोहानी एक बेहतरीन शायर थे उन्हें पढ़ाई का शौक बचपन से ही था यही कारण था कि उन्होंने राज्य स्तरीय परीक्षा में टॉप किया था अपनी गजलों में उन्होंने रूमानियत के साथ-साथ समाज, इतिहास और सत्ता के बारे में काफी कुछ लिखा है और अपनी उर्दू शायरी के माध्यम से औरतों को ऊंचा मुकाम दिया है। मौलाना हसरत मोहानी हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। आजादी की रवायत के मुताबिक वे अवध की तहजीब के प्रतिनिधि कवि हैं और रसखान के बाद कृष्ण पर फिदा एक अजीम शख्सियत।  उनका इस्लाम पर पक्का विश्वास था लेकिन दूसरों के विश्वास और धर्म का आदर हसरत मोहानी करते थे। उनका हिंदुस्तानी मुसलमानों को संदेश है कि वह अपने ईमान पर कायम रहते हुए हिंदुस्तान की परंपराओं से जुड़े रह सकते हैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ही उन में देशभक्ति का जज्बा जगह था 1930 में अपनी किताब के जरिए अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की आलोचना की 1904 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े और 1905 में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक द्वारा चलाए गए स्वदेशी आंदोलन में भी हिस्सा लिया। 1907 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया महात्मा गांधी ने उनको महान बताया और आजादी के आंदोलन में उनकी भागीदारी की अनेक मौके पर तारीख की है 1921 में इंकलाब जिंदाबाद का नारा देने वाले हसरत मोहानी ही थे, इस नारे को बाद में भगत सिंह ने अपना कर मोहानी साहब और नारे को अमर बना दिया। आज भी जब कहीं गैर बराबरी और सत्ता के खिलाफ कोई विरोधी आंदोलन चलता है, तो इंकलाब जिंदाबाद का नारा उसका खास हिस्सा होता है। वह बाल गंगाधर तिलक, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के करीबी दोस्त थे, तथा भारत के पूर्ण स्वराज्य की मांग के हिमायती थे। 1946 में उत्तर प्रदेश राज्य से संविधान सभा के सदस्य के रूप में इनको भेजा गया था। भारत विभाजन का इन्होंने विरोध किया और अपने भारतीय होने पर नाज किया, हिंदू-मुस्लिम एकता की विरासत को संजोए इस महान व्यक्तित्व ने 13 मई1951 को दुनिया को अलविदा कह दिया।

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