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कविता :- पर्वत नाचें हाथ उठाकर

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डाल-डाल  पर  जल बिन्दु, मेघों  से मुक्ति पा कर

सावन गीत की लय मांगे मुझसे शब्दों को आकर

कहदे  कहदे   पवन  बावरी  दे  दूं  गीत  सजाकर

शर्त  केवल  इतनी  सी  पर्वत  नाचें  हाथ  उठाकर

गाएं स्वर में स्वर मिलाकर

झरनों  की अन्जानी भाषा मेरी  है  पहचानी

लहराती चुनरी की खुशबू में है मस्त कहानी

नीले  सागर  के ह्रदय से चुरा चुरा जो लाया

हरे  गुलाबी  रंग  दूं  शब्द भर दूं गहरा पानी

ओ हरियाली सावन की ले आ मधुशाला जाकर

आज तेरे आंचल पर  लिख  दे  दूं गीत सजाकर

शर्त केवल इतनी सी पर्वत नाचें हाथ…………….

 

सिन्दूरी किरनों को चुन लूं ,अम्बर की ऊंचाई भर लूं

धरती के प्यासे ओटों से अपने मन की प्यास छुआ लूं, जलते  दीपक  की लौ  में  तारों  की गणना कर जाऊं

बैठ   किसी  वृक्ष   तले   आकाश   में   चांद   निहारुं

रजत कणों को बिखरा दूं पत्तों की नींद चुराकर

सन्नाटों  के वक्ष  पे लिख  दे दूं  गीत  सजाकर

शर्त केवल इतनी सी पर्वत नाचें हाथ उठाकर

गाएं स्वर में स्वर मिलाकर

रचियता:-  फ़ज़लुर्रहमान

मौलिक रचना

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