अलविदा जुमे की नमाज में शहर की मस्जिदों में रोजेदार अकीदतमन्दों का उमड़ा जनसैलाब
- अल्लाह की बारगाह में रोजेदारों ने गुनाहों की तौबा की
जोधपुर, (रॉयल पत्रिका)। रहमतों व बरकतों के महीने रमजान की 21वीं, 23वीं, 25वीं व 27वीं शबे-कद्र की रातों के साथ आज जुमातुल विदा (अलविदा जुम्मा) की नमाज में मुस्लिम समुदाय का हर शख्स अपने-अपने गुनाहों से पाक होने के लिए अल्लाह के दरबार में आजिज़ी (प्रार्थना करना) कर रहा है। प्रवक्ता शौकत अली लोहिया ने बताया कि ईदगाह मस्जिद के पेश इमाम व खतीब मौलाना मोहम्मद हुसैन अशरफी ने अपने खुत्बे (कुरआन की रोशनी में अल्लाह का उपदेश मस्जिद में सार्वजनिक रूप से सभी को देना) में शबे-कद्र (निर्णय की रात) की खुबी के साथ जमातुल विदा के बारे में खुत्बे में कहा कि जुमातुल विदा का मतलब छोड़कर जाने वाला दिन अर्थात माहे रमजान के पवित्र महिने के आखिरी जुमे के दिन को कहते है। मस्जिदों में जुमे की नमाज अदायगी से पहले पेश इमाम द्वारा जुमातुल विदा का खुत्बा पढ़ा जाता है। इस दिन अल्लाह के पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलैहि वस्सलम ने माहे रमजान में विशेष इबादत की। इसलिए माहे रमजान के इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोगों अपने कारोबार व दुनियावी कामकाज को छोड़कर ईदगाह के वसी मैदान में जमा होकर सामुहिक रूप से नमाज अदा करते है। अपने अगले-पिछले सभी गुनाहों के लिए अपने दामन को फैलाकर अल्लाह के दरबार में तौबा करने के लिए उमड़ पड़ते है।
- माहे रमजान का आखरी जुम्मा – मुफ्ती मौलाना शेर मोहम्मद रजवी, मुफ्ती ए आजम राजस्थान
माहे रमजान का हर दिन बरकत वाला दिन होता हैं, मगर आखरी जुम्मा बहुत ही बरकतों वाला दिन होता है। इस दिन में हर मुसलमान तन्दरुस्त हो या बीमार, हर हाल में जुम्मा की नमाज अदा करने की कोशिश करता है। इस दिन में ‘‘नमाज तस्बीह’’ (ईश्वर/अल्लाह की महिमा) भी जुमा से पहले पढ़ता है और अपने माल, जेवर और जानवरों की जकात भी इसी दिन में अदा करने की कोशिश करता है ताकि उसका माल पूरे साल तक सलामत रहे। अपना और अपने छोटे बच्चों का फितरा भी अदा करता है ताकि उसके रोजे अल्लाह के दरबार में कुबूल हो। अगर इस दिन तक अपने माल की ज़कात न दी तो उसकी नमाज़ कबूल नही होगी और फितरा नहीं दिया तो रोज़े कुबूल नहीं होंगे। तमाम मोमिन भाई अपनी-अपनी नमाज़े ईद, हर हाल में ईदगाह के वसी मैदान में जमा होकर ही अदा करें। यही इस्लाम का पैगाम (संदेश) है। (हदीस)
- रोजेदार गुनाहों से पाक व साफ – शहर खतीब व पेश इमाम काजी मोहम्मद तैयब अंसारी
हर इंसान की ख्वाहिश होती है कि उसे दुनिया और आखिरत में उसके रहने के लिए साफ सुथरी व आला दरजे की जगह हासिल हो। रोजेदारों के लिए आखिरत की जगह जन्नत है। उन रोजेदार इंसानों को जन्नत मिलेगी, जिन्होनें रोजे रखते हुए नमाज की पाबन्दी की, नेक अमाल व इबादत की, गरीबों व मिस्कीनों को ध्यान रखा। अल्लाह के रसूल फरमाते है कि जिसे शख्स ने रोजे रखने वाले रोजेदारों को सेहरी व इफ्तार के वक्त पानी पिलाएगा, वह अपने गुनाहों से पाक और साफ हो जायेगा गोया कि अभी अपनी मां के पेट से पैदा हुआ हो।
- रमजान में जुमे की अहमियत : शौकत अली लोहिया (समाजसेवी शिक्षक व प्रवक्ता)
जुमे के दिन को छोटी ईद कहा जाता है और जुमे के दिन को सारे दिनों का सरदार कहा जाता है। जुमे के नमाज के दिन मुसलमान नहा धोकर, इत्र (खुशबु) लगाकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से समय निकालकर नमाज अदा करने के बाद देश के लिए अमनो-चौन की दुआ करने व गरीबों, मिस्कीनों की मदद करने के साथ आपस में एक-दूसरे को मुबारकबाद देता है। माहे रमजान का महीना आते ही रहमत के सारे दरवाजे खोल दिये जाते है और जहन्नुम के दरवाजों को बन्द कर दिया जाता है। शैतानों को जंजीरों में बांध दिया जाता है।
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