बच्चों की परवरिश में पिता का अहम किरदार
बच्चों की परवरिश में पिता का अहम किरदार बच्चे की परवरिश एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है, जो उसके अच्छे या बुरे भविष्य की बुनियाद रखती है। यह सिर्फ एक रस्मी फ़र्ज़ नहीं बल्कि एक मुक़द्दस जिम्मेदारी है, जिसमें अच्छे अख़लाक, समाजी और दीन के उसूलों की बुनियाद डाली जाती है। इस सफ़र में माँ की गोद बच्चे के लिए सबसे बड़ा सुकून होता है, जबकि बाप एक मज़बूत सहारा बनता है, जो बच्चे को हौसला, खुद ऐतमादी (आत्मविश्वास) और सही फैसले करने की सलाहियत देता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बाप का रवैया और उसके जीने का अंदाज़ बच्चों की सोच और आदतों पर गहरा असर डालता है। मशहूर बाल मनोवैज्ञानिक प्रोफ़ेसर जमीर बी. वासन कहते हैं, “बाप सिर्फ घर का एक सदस्य नहीं होता, बल्कि बच्चों के लिए एक मिसाल होता है, जो उन्हें ज़िंदगी की मुश्किलों से निपटना सिखाता है।” एक तजुर्बे में पाया गया कि जिन बच्चों को अपने बाप का ज्यादा साथ मिला, उनका आई क्यू ज्यादा था, वे अपने करियर और समाज में बेहतर मुक़ाम हासिल कर पाए। ब्रिटेन में 11000 से ज्यादा लोगों पर की गई एक तहकीक (शोध) में देखा गया कि जिन बच्चों के बाप उनके साथ ज्यादा वक़्त बिताते हैं, वे ज़्यादा कामयाब और खुशहाल होते हैं। बाप का दीन और अख़लाकी परवरिश में किरदार बाप अपने अमल (कर्म) और बातों से बच्चों को सिखाता है कि ज़िंदगी की मुश्किलों का सामना कैसे किया जाए और जिम्मेदारियों को कैसे निभाया जाए। बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने बाप को करते हुए देखते हैं। अगर बाप बच्चों की तालीम (शिक्षा) में रुचि ले, तो वे ज्यादा मेहनती और क़ामयाब होते हैं। बच्चों की अख़लाकी (नैतिक) परवरिश उनके किरदार को निखारती है। बाप को चाहिए कि वह बच्चों को सच बोलना, सब्र करना और दूसरों की मदद करना सिखाए। इस्लाम और दूसरे मज़ाहिब (धर्म) में भी बाप की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया गया है। बच्चों को नमाज़, कुरआन की तिलावत और नबी करीम (सल्ल.) की सीरत से सीखना चाहिए। अगर बाप खुद अच्छे आमाल (कर्म) करे, तो बच्चे भी दीन की तरफ़ रुझान रखते हैं। आज के दौर में बाप की ज़िम्मेदारी आज की टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के दौर में बच्चों की परवरिश में बहुत से नए चैलेंज सामने आ रहे हैं। बाप की सिर्फ यही जिम्मेदारी नहीं कि वह बच्चों की माली (आर्थिक) ज़रूरतें पूरी करे, बल्कि उन्हें सही और ग़लत का फ़र्क भी सिखाए। अगर बाप बच्चों की ज़िंदगी में एक सक्रीय (Active) किरदार निभाए, तो बच्चे ज़्यादा समझदार और खुद ऐतमाद होते हैं। तहकीक (शोध) बताती है कि जिन बच्चों को अपने बाप का भरपूर वक़्त मिलता है, वे ज़िंदगी में ज़्यादा ख़ुश और क़ामयाब होते हैं।
एक सबक़ देने वाली कहानी
राशिद एक स्कूल का बच्चा था, जो हर शाम अपने दोस्तों के साथ बेफज़ूल (बिना मकसद) वक़्त गुज़ारने लगा। उसके बाप हमेशा अपने काम में मसरूफ़ रहते थे और उसके पास बैठकर बात करने का वक़्त नहीं निकालते थे। धीरे-धीरे राशिद को घर से बाहर ज़्यादा अच्छा लगने लगा और उसकी सोहबत (संगत) बिगड़ गई। एक दिन उसके दोस्तों ने उसे एक ग़लत काम में शामिल कर लिया और मामला पुलिस तक जा पहुंचा। जब राशिद के बाप को इस बात का पता चला, तो वे घबराकर थाना पहुंचे। उस दिन पहली बार राशिद ने अपने बाप की तरफ़ ऐसा देखा, जैसे कह रहा हो, “अगर आपने मुझे थोड़ा वक़्त दिया होता, तो शायद मैं इस हाल में न होता।” उस दिन राशिद के बाप को एहसास हुआ कि उनकी मसरूफ़ियत (व्यस्तता) ने उनके बेटे को ग़लत रास्ते पर डाल दिया है। उन्होंने फैसला किया कि अब वे अपने बेटे को वक़्त देंगे, उसकी बातें सुनेंगे और उसके सबसे अच्छे दोस्त बनेंगे। धीरे-धीरे राशिद बदल गया, उसकी पढ़ाई में दिलचस्पी बढ़ी और वह अपने माँ-बाप के क़रीब आ गया।
बच्चों की परवरिश एक जारी (चलने वाली) प्रक्रिया है और बाप इसमें सबसे अहम किरदार अदा करता है। चाहे वह दीन की तालीम हो, अख़लाकी आदाब (नैतिकता) हो, या दुनिया की तालीम—बाप की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने अमल, बातों और मोहब्बत से बच्चों की ज़िंदगी सँवारे। अगर बाप अपने बच्चों को सही वक़्त और तवज्जो (ध्यान) नहीं देता, तो बच्चे सही रास्ते से भटक सकते हैं। एक अच्छा बाप सिर्फ अपने बच्चों को नहीं संवारता, बल्कि पूरे समाज को अच्छे इंसान देता है।
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