इस्लाम में फ़र्ज़ है रोज़़ा
- तीसरी किस्त…….
यह मिसाल इस तफ्सील के साथ आपके सामने बयान की गई है, इस पर आप गौर करें तो आपकी समझ में आ सकता है कि आज आपकी इबादतें क्यों बेअसर हो गईं ? आपकी सबसे बड़़ी गलती यही है कि आपने नमाज़ रोजों के अरकान की ज़़ाहिरी सूरतो ही को असल इबादत समझ रखा है और इस गुमान में फंस गये हैं कि जिसने ये अरकान पूरी तरह अदा कर दिये, उसने बस अल्लाह की इबादत कर दी। आपकी मिसाल उस आदमी जैसी है जो खाने के चारों अरकान यानि निवाले बनाना, मुंह में रखना, चबाना, हलक से नीचे उतार देना, बस इन्हीं चारों के मजमूए को खाना समझता है और यह ख्याल करता है, जिसने ये चारों अरकान अदा कर दिये, उसने खाना खा लिया और खाने के फायदे उसको हासिल होने चाहिए, भले ही उसने उन अरकान के साथ मिट्टी और पत्थर अपने पेट में उतारे हों, या रोटी खाकर फौरन कै कर दी हो। अगर हकीकत में लोग इस गलत गुमान में फंस नहीं गए हैं तो बताइये कि यह क्या माजरा है कि जो रोज़़ेदार सुबह से शाम तक अल्लाह की इबादत में मशगूल रहता है, वह ठीक इस इबादत की हालत में झूठ कैसे बोलता है ? गीबत किस तरह करता है ? बात-बात पर लड़ता क्यों है ? उसकी ज़़ुबान से गालिया क्यों निकलती हैं ? वह लोगों का हक कैसे खाता है ? हराम खाने और खिलाने का काम किस तरह कर लेता है और फिर यह सब काम करके भी अपने नज़दीक यह कैसे समझता है कि मैंने खुदा की इबादत की है ? क्या उसकी मिसाल उस आदमी जैसी नहीं है, जो राख और मिट़टी खाता है और सिर्फ़ खाने के चार अरकान अदा कर देने को समझता है कि खाना इसी को कहते हैं। फिर बताइऐ कि यह क्या माज़रा है कि रमज़़ान भर में तकरीबन 360 घण्टे खुदा की इबादत करने के बाद जब आप फारिग होते हैं तो इस पूरी इबादत के तमाम असरात शव्वाल की पहली तारीख ही को खत्म हो जाते हैं ? अन्य लोग अपने त्यौहारों में जो कुछ करते हैं, वही सब आप ईद में करते हैं। हद यह है कि शहरों में तो ईद के दिन बदकारी और शराबनोशी तक होती है और कुछ ज़़ालिम तो ऐसे हैं, जो रमज़़ान के ज़माने में दिन में रोज़़ा रखते हैं और रात को शराब पीते हैं और जि़ना करते हैं। आम मुसलमान खुदा के फज़्ल से इतने बिगड़़े हुए तो नहीं, मगर रमज़़ान खत्म होने के बाद आप में से कितने ऐसे हैं जिनके अंदर ईद के दूसरे दिन भी तक़्वा और परहेज़गारी का कोई असर बाकी रहता है ? खुदा के कानूनों के खिलाफवरजी में कौन-सी कसर उठा रखी है ? नेक कामों में कितना हिस्सा लिया जाता है ? और नफसा नियम में क्या कमी आ जाती है ? सोचिए और गौर कीजिए कि इसकी वजह आखिर क्या है ? यकीन के साथ कहा जा सकता है कि इसकी वजह सिर्फ़ यह है कि आपके दिमाग में इबादत का मफ़हूम और गलत हो गया है। आप यह समझते हैं कि सहरी से लेकर मगरिब तक कुछ न खाने और पीने का नामरोज़़ा है और बस यही इबादत है। इसीलिए रोज़़े की तो आप पूरी हिफाजत करते हैं। खुदा का खौफ आपके दिल में इस कद्र होता है कि जिस चीज़ से रोज़़ा टूटने का ज़रा भी खतरा हो। उससे भी आप बचते हैं। अगर जान पर भी बन जाए तब भी रोज़़ा तोडऩे में झिझक होती है। लेकिन आप यह नहीं जानते कि यह भूखा-प्यासा रहना असल इबादत नहीं है, बल्कि इबादत की सूरत है और यह सूरत मुकर्रर करने का मकसद यह है कि आपके अन्दर खुदा का खौफ और खुदा की मुहब्बत पैदा हो और आपके अन्दर इतनी ताकत पैदा हो जाए कि जिस चीज़ में दुनिया भर के फायदे हों, मगर खुदा नाराज़ होता हो, उससे अपने नफ़्स पर जब्र करके बच सकें और जिस चीज़ में हर तरह के खतरे और नुकसान हों, मगर खुदा उससे खुश होता हो, उस पर आप अपने नफ़्स को मजबूर करके तैयार कर सकें । यह ताकत इसी तरह पैदा हो सकती थी कि आप रोज़़े के मक़सद को समझने और महीने भर तक अपने खुदा के खौफ और खुदा की मुहब्बत में अपने नफ़्स को ख्वाहिशों से रोकने और खुदा की रज़़ा के मुताबिक चलाने की जो मश्क की है, उससे काम लेते। मगर आप तो रमज़़ान के बाद ही इस मश्क को और इन खूबियों को, जो इस मश्क से पैदा होती हैं, इस तरह निकाल फैंकते हैं जैसे खाना खाने के बाद कोई आदमी उंगली डालकर कै़ कर दे। बल्कि आप में से कुछ लोग तो रोज़़ा खोलने के बाद ही दिन भर की परेशानी को उगल देते हैं। फिर आप ही बताइए कि रमज़़ान और उसके रोज़़े कोई जादू तो नहीं हैं कि बस उसकी ज़़ाहिरी शक्ल पूरी कर देने से आपको वह ताकत हासिल हो जाये, जो हकीकत में रोज़़े से हासिल होनी चाहिये। जिस तरह रोटी से जिस्मानी ताकत उस वक़्त तक नहीं हासिल हो सकती, जब तक कि वह मैदे में जाकर हज़म न हो और खून बनकर जिस्म की रग-रग में न पहुंच जाये, उसी तरह रोजे से भी रूहानी ताकत उस वक्त तक हासिल नहीं होती जब तक कि आदमी रोज़़े के मक़सद को पूरी तरह समझे नहीं और अपने दिल व दिमाग के अन्दर उसको उतारने और खयाल, नीयत, इरादा और अमल सब पर छा जाने का मौका न दे।
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