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आजाद हिंद फौज के हीरो कर्नल महबूब अहमद

Jaipur

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जन्मदिन पर विशेष…..

आजाद हिंद फौज के नायक और अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर लेने वाले एक महान योद्धा कर्नल महबूब अहमद का जन्म 19 मार्च 1920 को पटना के एक छोटे से गांव में हुआ। उनके पिता डॉक्टर थे इसलिए महबूब की पढ़़ाई  लिखाई भी अच्छे माहौल में हुई शुरुआती पढ़़ाई देहरादून में हुई। उसके बाद महबूब अहमद इंडियन मिलिट्ररी एकेडमी आईएमए देहरादून में पड़़े। अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण कर के ब्रिटिश सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर भर्ती हुए। दरअसल एक मौके पर कर्नल मेहबूब अहमद ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का देश प्रेम से जुड़ा एक भाषण सुना,जिससे वह अंग्रेज़ी हुकू मत की नौकरी छोड़कर आजाद हिंद फौज में शामिल होने का जज्बा दिया। दिलचस्प बात यह है कि म्यांमार की सीमा पर कर्नल मेहबूब अमहद की पहली मुठभेड़ ब्रिटिश सेना से ही हो गई। जिसमें उन्होनें अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ाकर आजाद हिंद फौज को ऐतिहासिक जीत दिलाई। 1944 में इंफाल के करीब एक लंबी लड़़ाई के बाद आज़ाद हिंद फौज के योद्धा कर्नल शौकत मलिक, लाल सिंह, रामप्रसाद मोहम्मद खान,  मेजर आबिद हसन के साथ मिलकर उन्होनें इंफाल में आजाद हिंद फौज का परचम लहरा दिया। आजाद हिंद फौज में सभी धर्ममों के लोग थे। आज देश में जो लोग सांप्रदायिक माहौल पैदा करने की कोशिश करते हैं उन्हहेंइन जांबाज़ो की जीवनी पढ़नें की जरूरत है। कर्नल महबूब अहमद अपनी किताब ‘मौत की मस्ती और जीने का शौक’ में अपने साथियो को याद करतें हुए लिखते है कि तमाम चेहरे जो हर पल मेरे साथ आसपास साए की तरह है वह सब हमारे साथी दोस्त हैं। जिनमें कर्नल हबीब, कैप्टन रामसिंह, शौकत मलिक से लेकर हम सब चहते अजीज नेताजी सुभाष चंद्र बोस है। नेताजी  जिनकी कल्पना भर से हमारी भुजाएं फड़कने लगती है और काफी देर तक कानों में जय हिंद का शंखनाद गूंजता रहता है उनकी यह किताब 1993 में उर्दू जबान में बिहार की ऐतिहासिक लाइब्रेरी से प्रकाशित कराई थी। कर्नल  मेहबूब अहमद ने आखरी सांस 9 जून 1992 में ली जिनके कानों में आखरी सांस तक गूंजता रहा ‘जय हिंद’।

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