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गंगा बहाईये

Jaipur

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चूल्हे  की  आग  पेट  में  अपने  जलाईये

कुछ अधजली  लकड़ियां  मुंह में दबाइये

हल्का अंधेरा पी के  उगल  जाओ रोशनी

या  आंख  में  भर   के  धुआं  मुस्कुराईये

दांतों  को  दबाने  का  इरादा  न  कीजिए

हर  दांत  में  भरा  ज़हर  पहले निकालिये

सन्नाटा   मंदिरों   का   देवता  सुला   गया

बहरा  नहीं  है  कृष्ण  कोई  मीरां बुलाइये

हर  पीठ  देखती  है  अपने  पेट  का  गढ्ढा

सरकार  अब  तो  इनको  खाना खिलाइये

मानव  तुम्हारी  अस्तियां   बैचैन   पड़ीं  हैं

शंकर  जटा  से अपनी  फिर गंगा  बहाईये

तख़लीक़ :- फ़ज़लुर्रहमान

सहायक सचिव सेवानिवृत्त

मोबाईल नं9828668877

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