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अनिवार्य शिक्षा एवं रोजगार देने के बजाय राजनीतिक पार्टियों मुफ्त की रेवड़ियाँ बांटने की घोषणा कर रही है।

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देश की जनता को प्रलोभन देकर सत्ता में आना चाहती राजनीतिक पार्टियां

जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट नहीं बढ़ा रही है सरकारें।

मुन्ना खान

जयपुर (रॉयल पत्रिका )। देश में आम चुनाव हों या राज्यों में विधानसभा चुनाव हो, राजनीतिक पार्टीयां आजकल नगद राशि देने की घोषणा करने लगी है। यह राशि घर की महिलाओं,  लड़कियों, बुजुर्ग पेंशन, किसानों आदि के खातों में नगद ऑन लाईन ट्रांसफर की जाती है। वैसे नगद राशि देने की घोषणाएं ज्यादातर चुनावों से पहले की जाती है। जिससे जनता उसको मतदान के जरिये अपना समर्थन दें। नगद राशि मिलने से महिलाओं, बुजुर्गों एवं बच्चियों को प्रत्यक्षरूप से फायदा मिलता है और वे अपनी मर्जी से खर्च कर सकते हैं। राजस्थान की कांग्रेस सरकार में बुजुर्गों, महिलाओं आदि को पेंशन शुरू की गई थी। इसी प्रकार केंद्र की मोदी सरकार किसान सहायता निधि के नाम पर एक किसान परिवार को वर्ष में 12 हजार रूपये खाते में नगर ट्रांसफर करती है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार दिल्ली में रहने वाले परिवारों का बिजली पानी और शिक्षा का पूरा खर्च उठाती है। कर्नाटक सरकार महिला मुखिया को 2 हजार रूपये महीने नगद खाते में ट्रांसफर करती है। इसी तरह पश्चिमी बंगाल सरकार एक हजार रुपए महीने गरीब महिलाओं को नगद राशि देती है। ऐसी घोषणा करने वाली पार्टियों को चुनाव में राजनीतिक लाभ मिलता है। केजरीवाल की मुफ्त की योजनाओं को फ्री की रेवड़ी बताने वाली भाजपा अब स्वयं ऐसी घोषणाएं कर रही है। मुफ्त की योजनाओं के मामले में दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने सबको पीछे छोड़ रखा है। सोचने की बात यह है कि मुफ्त की योजनाएं एवं नगद राशि देने से देश की आर्थिक सेहत पर गलत प्रभाव पड़ता है। यदि राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने सत्ता में रहकर ईमानदारी से काम किया होता तो मुफ्त की योजनाओं की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन राजनीतिक पार्टिया मतदाताओं को प्रलोभन देकर ही चुनाव जीतना चाहती है। यह प्रलोभन नगद राशि का मुफ्त बिजली, पानी, दवाई और धर्म एवं जातिवाद का होता है। देश की जनता अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है जितनी होनी चाहिए।

शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट नहीं बढ़ रहा है

केंद्र सरकार का शिक्षा और स्वास्थ्य पर पिछले साल बजट नहीं बढ़ा। इसी तरह देश में सभी दलों की सरकारें भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्चा नहीं बढ़ा रही हैं। इसलिए देश में शिक्षा का प्रतिशत बहुत धीमी गति से बढ़ रहा है शिक्षित नहीं होने और कम शिक्षित होने के कारण युवाओं को रोजगार मिलना मुश्किल होता है। ज्यादातर युवाओं को अनओर्गनाइज्ड सेक्टर में मजदूरी करनी पड़ती है। मुफ़्त योजनाओं के कारण राज्यों और केंद्र सरकार की आर्थिक हालत खराब होती जा रही है। यदि सरकारें मुफ्त की योजनाओं और नगद राशि की जगह मुफ़्त शिक्षा और रोजगार देने का इंतजाम करें, तो देश आर्थिक रूप से मजबूत एवं शिक्षित हो सकता है। मुफ्त की योजनाओं में खर्च करने के बाद सरकारों के पास जरूरी कामों और शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए पैसा ही नहीं बचता है। राजनीतिक दल मुफ़्त की योजनाओं की परंपरा चला कर देश को कमजोर कर रहे हैं। कमजोर आर्थिक स्थिति में और ठोस नीतियों के अभाव में देश कभी तरक्की नहीं कर सकता है। राजनेताओं के लिए सत्ता में आकर कुर्सी हथियाना जरूरी हो गया है, जबकि उनके लिए देश जरूरी होना चाहिए। इसलिए कहा जा सकता है कि यह मुफ्त की योजनाएं एक दिन देश को बर्बाद कर देगी।

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