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आजाद हिंद फौज के कप्तान फ्रीडम फाइटर अब्बास अली

Jaipur

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पुण्यतिथि पर विशेष आलेख….

अब्बास अली, आज़ाद हिंद फौज के कप्तान, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अत्यंत साहसी, निस्वार्थ और प्रेरणादायक नेता थे। उनका जीवन स्वाधीनता प्राप्ति के प्रयास और बाद में समाजवादी विचारधारा पर आधारित सामाजिक आंदोलनों के लिए प्रसिद्ध है। अब्बास अली का व्यक्तित्व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति की मिसाल प्रस्तुत करता है। अब्बास अली का जन्म 3 जनवरी 1920 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के खुर्जा के कलंदर गढ़ी गांव में मुस्लिम राजपूत परिवार में हुआ था। उनके खानदान में भी स्वतंत्रता संग्राम का समृद्ध इतिहास था। उनके दादा रुस्तम अली खान ने 1857 की क्रांति में भाग लिया था और फांसी दी गई थी। उनके पिता अय्यूब अली खान ब्रिटिश सेना में अधिकारी थे और प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा ले चुके थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा खुर्जा और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पूरी हुई। अब्बास अली ने 1939 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट करने के बाद रॉयल इंडियन आर्मी सप्लाई कॉर्प्स (R.I.A.S.C) में कमीशन प्राप्त किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे ब्रिटिश सेना में तैनात थे लेकिन नेता जी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान और समाजवादी गुरु प्रो. के.एम. अशरफ़ की प्रेरणा से उन्होंने ब्रिटिश सेना के खिलाफ विद्रोह किया। जापानियों के हाथों ब्रिटिश सेना की हार के बाद उन्हें युद्ध बंदी बना लिया गया, जिसके बाद उन्होंने जनरल मोहन सिंह द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फौज (आईएनए) में शामिल होकर सशस्त्र विद्रोह का रास्ता चुना। अब्बास अली आज़ाद हिंद फौज में कप्तान बने और रंगून, सिंगापुर, अराकान जैसी जगहों पर मित्र राष्ट्रों की सेनाओं से लड़ाई लड़ी। ‘दिल्ली चलो’ अभियान में उनकी भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण रही। जब जापान की हार के बाद आईएनए के जवानों को बंदी बना लिया गया तो अब्बास अली सहित उनके सहयोगियों पर मुल्तान के किले में मुकदमा चला, और उन पर बगावत के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई। भारत की आज़ादी की घोषणा के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन उन्हें भारत की नवगठित सेना में शामिल नहीं किया गया और ना ही कोई सरकारी सम्मान या पेंशन मिली।

स्वतंत्रता के बाद जीवन और समाजवादी आंदोलन-

स्वतंत्रता के बाद अब्बास अली ने समाजवादी राजनीति को अपना लिया। वे राम मनोहर लोहिया के करीबी सहयोगी थे और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव का पद संभाला। चौधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के राजनीतिक सफर में उनका योगदान प्रमुख रहा। उन्होंने अपने जीवनकाल में किसी प्रकार का सरकारी सम्मान या भत्ता स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वे राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रतीक थे।

प्रेरणा और विरासत-

अब्बास अली की आत्मकथा ‘न रहूँ किसी का दस्तनिगर’ में उनके संघर्ष और समाजवादी सोच की स्पष्ट झलक मिलती है। उनका जीवन आज़ादी, साहस, न्याय और समाज सेवा के लिए प्रेरणा है। वे 11 अक्टूबर 2014 को इस दुनिया से रुखसत हुए, लेकिन उनकी कहानी भावी पीढ़ियों को साहस और देशभक्ति की प्रेरणा देती रहेगी। अब्बास अली का योगदान न सिर्फ आज़ादी के संघर्ष में, बल्कि आज़ादी के बाद समाजवादी आंदोलनों में भी अमिट है। वे सच्चे राष्ट्रवादी, एक निर्भीक योद्धा, और समाज के लिए निस्वार्थ सेवक माने जाते हैं।

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