माँ-बाप की ख़िदमत: हर इबादत से ऊँचा मक़ाम
इस्लाम में अल्लाह के हक़ के बाद सबसे बड़ा हक़ वालिदैन (माता-पिता) का रखा गया है। दुनिया के तमाम रिश्तों में कोई न कोई ग़रज़ (स्वार्थ) शामिल होती है, लेकिन सिर्फ़ माँ-बाप की मुहब्बत ही ऐसी है जो बिल्कुल बे-ग़रज़ होती है। वे अपनी औलाद के लिए अपनी जान तक क़ुर्बान करने को तैयार रहते हैं और बदले में किसी चीज़ की उम्मीद नहीं करते। इसी बे-ग़रज़ मुहब्बत और क़ुर्बानी की वजह से अल्लाह तआला ने उनका दर्जा बहुत बुलंद किया है।
वालिदैन की ख़िदमत में अल्लाह ने इतना बड़ा अज्र-ओ-सवाब (पुण्य) रखा है कि उसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। हदीस शरीफ़ में आता है कि जो शख़्स अपने वालिदैन को मुहब्बत की नज़र से एक मर्तबा देखता है, अल्लाह तआला उसे एक मक़बूल हज और उमरे के बराबर सवाब अता फ़रमाते हैं।
ख़िदमत या जिहाद?
एक सहाबी, हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि या रसूलल्लाह! मैं जिहाद में जाकर सवाब हासिल करना चाहता हूँ। आपने पूछा: “क्या तुम्हारे वालिदैन ज़िंदा हैं?” उन्होंने कहा: “जी, ज़िंदा हैं।” हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इरशाद फ़रमाया: “जाओ और उनकी ख़िदमत करो। तुम जो अज्र जिहाद से हासिल करना चाहते हो, वो तुम्हें उनकी ख़िदमत से ही मिल जाएगा।” एक दूसरी रिवायत में है कि “उनकी ख़िदमत में ही जिहाद करो।”
इस वाक़िये से यह गहरा सबक मिलता है कि दीन सिर्फ़ अपने शौक़ और जज़्बात को पूरा करने का नाम नहीं है। दीन का असल तक़ाज़ा यह है कि देखा जाए कि उस वक़्त अल्लाह की तरफ़ से हमारे ऊपर क्या ज़िम्मेदारी है। अगर किसी के वालिदैन को उसकी ख़िदमत की ज़रूरत है, तो उस वक़्त उनके लिए सबसे बड़ा जिहाद और सबसे अफ़ज़ल अमल उनकी ख़िदमत करना ही है, भले ही उसका दिल मस्जिद की पहली सफ़ या जिहाद के मैदान में जाने को क्यों न चाहता हो।
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