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ग़ीबत: हुक़ूक़-उल-इबाद की सबसे आम ख़िलाफ़वर्ज़ी

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इस्लाम में इबादत (उपासना) के दो प्रमुख हिस्से हैं: एक हुक़ूक़-अल्लाह (अल्लाह के अधिकार) और दूसरा हुक़ूक़-उल-इबाद (बन्दों के अधिकार)। अक्सर हम नमाज़, रोज़ा, ज़िक्र जैसी इबादतों को ही दीन समझते हैं और बन्दों के हुक़ूक़ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जबकि हुक़ूक़-उल-इबाद का मामला ज़्यादा संगीन और नाज़ुक है। अल्लाह चाहे तो अपने हुक़ूक़ माफ़ कर सकता है, लेकिन किसी बन्दे का हक़ तब तक माफ़ नहीं होता, जब तक वह बन्दा ख़ुद माफ़ न कर दे।

इसी हुक़ूक़-उल-इबाद में एक ऐसा गुनाह है जिसे हमारे मुआशरे (समाज) ने गुनाह समझना ही छोड़ दिया है, और वो है ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई करना)। हम अपनी महफ़िलों में, दोस्तों के साथ उठते-बैठते बड़ी आसानी से दूसरों की ग़ीबत कर जाते हैं और हमें इसका एहसास तक नहीं होता।

इसकी संगीनी का अंदाज़ा इस मिसाल से लगाया जा सकता है कि ग़ीबत करना शराब पीने से भी ज़्यादा बुरा हो सकता है। क्योंकि जो शख़्स शराब पीता है, वह कम-से-कम अपने आपको गुनहगार समझता है और शायद तौबा कर ले। लेकिन ग़ीबत करने वाला तो ख़ुद को हक़ पर समझता है, उसे यह गुनाह लगता ही नहीं। जिस गुनाह का एहसास ही मर जाए, उससे तौबा की उम्मीद भी कम हो जाती है।

क़ुरआन-ए-करीम ने ग़ीबत करने को अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाने के बराबर क़रार दिया है। यह एक ऐसी डरावनी मिसाल है जो इस गुनाह की घिनौनी हक़ीक़त को सामने लाती है।

इसलिए, हमें अपनी ज़बान की हिफ़ाज़त करनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि दीन सिर्फ़ इबादतों का नाम नहीं, बल्कि दूसरों के हुक़ूक़ अदा करने और उन्हें तकलीफ़ न पहुँचाने का भी नाम है। अगर हमसे कभी ग़ीबत हो जाए, तो सिर्फ़ अल्लाह से माफ़ी मांगना काफ़ी नहीं है, बल्कि उस शख़्स से भी माफ़ी मांगनी होगी जिसका हक़ हमने बर्बाद किया है।

 

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