नेपाल में फंसे भारतीयों की आपबीती: दहशत, भूख और मौत का डर
एयरपोर्ट बना कैदखाना: तीन दिन से बंद यात्री
नई दिल्ली (एजेंसी)। नेपाल इन दिनों गहरे राजनीतिक संकट और हिंसा की आग में झुलस रहा है। 8 सितंबर से शुरू हुई हिंसक घटनाओं ने न सिर्फ नेपाल की सड़कों को असुरक्षित बना दिया है, बल्कि वहां फंसे सैकड़ों भारतीयों की जिंदगी भी दांव पर लगा दी है। जिन भारतीयों ने कभी नेपाल की यात्रा को पर्यटन, इलाज या धार्मिक उद्देश्यों से किया था, आज वही लोग खुद को एक कैदखाने जैसी स्थिति में पा रहे हैं। हवाई अड्डों पर तीन-तीन दिन से फंसे लोग बताते हैं कि न सिर्फ बाहर निकलना मुश्किल है बल्कि खाने-पीने तक के लाले पड़ गए हैं।
हवाई अड्डा बना बंदीगृह
काठमांडू एयरपोर्ट पर बड़ी संख्या में भारतीय परिवार फंसे हुए हैं। यहां कई महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग हैं। इन लोगों का कहना है कि वे तीन दिन से एयरपोर्ट के भीतर कैद जैसे हालात में हैं। हर तरफ से फायरिंग और धुआं उठने की खबरें आती रहती हैं, जिससे बाहर निकलने का साहस नहीं जुटा पा रहे। खाने-पीने की वस्तुएं धीरे-धीरे खत्म हो चुकी हैं। कई परिवार तो भूख की कगार पर पहुंच गए हैं।
गुजरात के सैकड़ों लोग मुश्किल में
सबसे ज्यादा परेशानी गुजरात से गए पर्यटकों और मरीजों को हो रही है। जानकारी के अनुसार, केवल गुजरात से ही 300 से ज्यादा लोग नेपाल में फंसे हुए हैं। इनमें राजकोट के करीब 43 लोग, अहमदाबाद के 9 और राजकोट जिले से ही 50 से 55 अन्य लोग शामिल हैं। इन सभी ने मजबूरी में स्थानीय होटलों, धर्मशालाओं और यहां तक कि वृद्धाश्रमों में भी पनाह ली है।
देवांगभाई चोकसी और उनका परिवार
इन फंसे हुए लोगों में सूरत नेशनल बैंक के डायरेक्टर देवांगभाई चोकसी और उनका परिवार भी शामिल है। उन्होंने वीडियो कॉल के जरिए सूरत के सांसद मुकेश दलाल से अपनी आपबीती सुनाई। देवांगभाई के अनुसार, 10 सितंबर तक हालात बेहद भयावह रहे। चारों ओर आगजनी, हिंसा और गोलीबारी का माहौल था। जिस होटल में वे ठहरे हुए थे, वहां तक बिजली काट दी गई थी। रातभर अंधेरे में परिवार के साथ बैठना पड़ा। उन्होंने बताया कि हर पल ऐसा लगता है जैसे जिंदगी और मौत के बीच फंसे हुए हों।
बस पर भी हमला, पत्थरबाजी से घायल
कुछ भारतीयों ने घर लौटने की कोशिश भी की, लेकिन रास्ते में हिंसक भीड़ का सामना करना पड़ा। कई बसों पर पत्थरबाजी हुई, जिसमें यात्रियों को चोटें भी आईं। हालात इतने बिगड़ गए कि स्थानीय लोगों ने सलाह दी कि वे बाहर न निकलें, वरना जान का खतरा हो सकता है।
बच्चे और महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान
इन भयावह हालातों में सबसे ज्यादा मुश्किल छोटे बच्चों और महिलाओं को झेलनी पड़ रही है। बच्चों के लिए दूध और बुनियादी जरूरतों की चीजें मिलना लगभग नामुमकिन हो गया है। कई परिवार दवाइयों की कमी से भी परेशान हैं, खासकर वे लोग जो इलाज करवाने नेपाल आए थे। जिन मरीजों को नियमित दवाएं लेनी होती हैं, उनके लिए स्थिति बेहद गंभीर बन चुकी है।
भारतीय दूतावास और सरकार से उम्मीदें
नेपाल में फंसे भारतीय लगातार भारत सरकार और दूतावास से मदद की गुहार लगा रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए वीडियो और संदेश भेजे जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि वे जल्द से जल्द सुरक्षित भारत लौटना चाहते हैं। भारत सरकार ने भी नेपाल में हालात पर नजर रखी हुई है, लेकिन जमीनी स्तर पर हिंसा और कर्फ्यू की वजह से राहत अभियान चलाना बेहद कठिन साबित हो रहा है।
मौत और जिंदगी के बीच संघर्ष
देवांगभाई चोकसी की आपबीती हो या अन्य यात्रियों की कहानी, सबमें एक समानता है—हर कोई जिंदगी के लिए जूझ रहा है। एक तरफ लगातार गोलीबारी और आगजनी की खबरें, दूसरी तरफ खाने-पीने की कमी और बिजली का न होना, लोगों के लिए मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से भारी पड़ रहा है।
न खत्म होने वाला इंतजार
तीन दिन से एयरपोर्ट और स्थानीय होटलों में बंद भारतीय अब सिर्फ एक ही आस लगाए बैठे हैं कि भारत सरकार उन्हें जल्द से जल्द सुरक्षित निकाल ले। परिवारजन लगातार अपने रिश्तेदारों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कई जगह नेटवर्क भी काम नहीं कर रहा। नेपाल की मौजूदा स्थिति ने वहां मौजूद भारतीयों को भय और असुरक्षा के अंधेरे में धकेल दिया है। हर तरफ अनिश्चितता और दहशत का माहौल है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, सभी भूख और डर से बेहाल हैं। लोग कहते हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि नेपाल जैसी नजदीकी और सुरक्षित मानी जाने वाली जगह पर उन्हें ऐसे दिन देखने पड़ेंगे। अब सबकी निगाहें केवल भारतीय सरकार और राहत प्रयासों पर टिकी हुई हैं, क्योंकि उनके लिए यही उम्मीद की आखिरी किरण है।
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