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रोज़ी की चिंता: तवक़्कुल और आख़िरत की तैयारी

Jaipur

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आज के दौर में इंसान चाहे अमीर हो या ग़रीब, हर किसी के दिल में एक ही सवाल है — कल का क्या होगा? रोज़ी कहाँ से आएगी? यही चिंता उसकी रातों की नींद और दिनों की सुकून को छीन लेती है। लेकिन जब हम इस मसले को क़ुरआन और हदीस की रौशनी में देखते हैं, तो मालूम होता है कि इंसान की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मेहनत और हलाल रास्ता अपनाने तक है। रोज़ी देने वाला असल में सिर्फ़ अल्लाह है।

दुनिया की हकीकत

क़ुरआन (सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ 43:33-35) में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर यह डर न होता कि लोग कुफ्र की तरफ़ झुक जाएँगे, तो काफ़िरों के घर सोने-चाँदी से सजाए जाते। यानी माल-दौलत असल मक़सद नहीं है, यह तो दुनिया का फ़ानी सामान है। असल इनाम आख़िरत में है, जो उन लोगों के लिए है जो अल्लाह से डरते और तवक़्कुल करते हैं।

ज़िंदगी की दो बड़ी नेमतें

हदीस (सहीह बुखारी 6412) में आख़िरी पैग़म्बर स.अ.व. ने फ़रमाया:

“दो नेमतें ऐसी हैं जिन्हें लोग अक्सर ज़ाया कर देते हैं — सेहत और वक़्त।”

इंसान सोचता है कि माल ही उसकी ज़िंदगी का सहारा है, जबकि असल दौलत उसकी सेहत और वक़्त है। इन्हें बर्बाद करके इंसान अपनी असली पूँजी खो देता है।

दुनिया की असली कीमत

एक हदीस (बुखारी 7418) में पैग़म्बर स.अ.व. ने दुनिया की मिसाल देते हुए कहा कि अल्लाह के नज़दीक इसकी हैसियत मरी हुई बकरी के बच्चे से भी कमतर है। दूसरी हदीस (सहीह मुस्लिम 2956) में फ़रमाया:

“मोमिन के लिए दुनिया एक क़ैद है और काफ़िर के लिए जन्नत।”

यानी जो तकलीफ़ें मोमिन को मिलती हैं, वही उसकी असल कामयाबी की निशानी हैं, क्योंकि जन्नत तक का रास्ता मुसीबतों से होकर जाता है।

आसान रास्ता हमेशा सही नहीं

एक हदीस के मुताबिक़, अल्लाह ने जन्नत को मुसीबतों और जहन्नम को ख्वाहिशों से ढक दिया है। इसका मतलब है कि जिस राह पर सब कुछ आसान नज़र आए, वो ज़रूरी नहीं कि सही हो। जो इंसान मेहनत करता है और मुश्किलों में सब्र करता है, वही आखिरत में असली कामयाबी पाता है।

दुनिया बनाम आख़िरत

क़ुरआन (सूरह आला 87:16-17) में चेतावनी दी गई है:

“बल्कि तुम दुनिया को तरजीह देते हो, जब कि आख़िरत बेहतर और हमेशा रहने वाली है।”

यानी दुनिया की चमक-दमक सिर्फ़ थोड़े वक़्त की है, जबकि आख़िरत की ज़िंदगी हमेशा की है।

असल राहत का पैग़ाम

क़यामत के दिन एक झलक जहन्नम की इंसान को सारी दुनियावी लज़्ज़तें भुला देगी, और एक झलक जन्नत की सारी तकलीफ़ें मिटा देगी (बुखारी 7088)। यही असल हक़ीक़त है। इसलिए रोज़ी की फिक्र छोड़कर, हलाल मेहनत, सब्र और तवक़्कुल का रास्ता अपनाइए।

नतीजा

इंसान का काम सिर्फ़ मेहनत और सही रास्ता चुनना है। रोज़ी देने वाला अल्लाह है, और असली कामयाबी आख़िरत की है। इसलिए दुनियावी दौलत पर घमंड या ग़म करने की बजाय, अल्लाह पर भरोसा रखिए और अपनी ज़िंदगी को आख़िरत की तैयारी में लगाइए।

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