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क्या मुसलमानों में फिरके इमामों ने बनाए

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इस्लाम में प्रसिद्ध चार इमामों से पहले मुसलमान अपने धार्मिक और कानूनी मामलों को मुख्य रूप से तीन आधारों पर सुलझाते थे: 1. कुरान,  2. सुन्नत (पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लललाहोअलैवसल्लम), और  3. सहाबा (पैगंबर के साथी) के इज्तिहाद ( स्वतंत्र तर्क जो क़ुरान, सुन्नत और इल्म पर आधारित होता है) ।

कुरान:   यह अल्लाह द्वारा पैगंबर  हज़रत मुहम्मद  सल्लललाहोअलैवसल्लम  पर नाजिल  मुक़द्दस  किताब है। इसमें इबादात से लेकर सामाजिक और वित्तीय लेनदेन (मुआमलात) तक, ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं के लिए नियम और  रहनुमाई   शामिल हैं ।

सुन्नत:  यह पैगंबर  हज़रत मुहम्मद सल्लललाहोअलैवसल्लम के शब्दों, कार्यों और अनुमोदनों से बनी है। यह कुरान में दिए गए संक्षिप्त नियमों का एक विस्तृत स्पष्टीकरण और व्यावहारिक उदाहरण  है । इज्तिहाद और सहाबा का अनुसरण:  जब कुरान और सुन्नत में किसी नए मुद्दे का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता था, तो विद्वान और विशेष रूप से सहाबा, इज्तिहाद का उपयोग करके एक निष्कर्ष पर पहुँचते थे । इस प्रक्रिया में, वे तर्क और विश्लेषण का उपयोग करके नए मामलों के लिए कानूनी निर्णय निकालते थे। इस तरह चार इमामों की आमद से पहले मुसलमान अपने दीनी और समाजी मामलातों, मसाहिल के हल क़ुरान, हदीस और इज्तिहाद  से निकालते थे। उस दौर में कोई फिरका नहीं था और ना ही कोई मसलक था।   हांलांकि उस दौर में भी कई मुस्लिम औलमा मौजूद थे जैसे हसन अल-बसरी – जन्म 642, मदीना, मृत्यु 728, बसरा में । प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान, उपदेशक, और तपस्वी , इस्लाम में सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक हस्तियों में से एक थे। अबू बक्र मुहम्मद इब्न सिरिन अल-अंसारी (33-110 हिजरी; 654-728 ईस्वी), इनका जन्म बसरा में हुआ था ।

आज सुन्नी  इस्लामिक जगत में  चार प्रसिद्ध

इमामों को प्रमुखता से  माना जाता  है, जो सुन्नी मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत हैं। ये इमाम हैं: इमाम अबू हनीफ़ा, इमाम मालिक, इमाम शाफ़ई, और इमाम अहमद इब्न हंबल । ये इमाम अपने-अपने समय में इस्लामी न्यायशास्त्र (फिक़्ह) के प्रमुख विद्वान थे, और उनके द्वारा फिक़्ह ,इस्लामिक कायदे कानून आज भी दुनिया भर के सुन्नी मुसलमान मानते हैं।

चारों इमामों का संक्षिप्त परिचय:

इमाम अबू हनीफा : (जन्म 699 ईस्वी, मृत्यु 767 ईस्वी) इन्हें  ताबईन में से एक माना जाता है, जिसका अर्थ है कि उन्होंने पैगंबर हजरत  मुहम्मद सल्लललाहोअलैवसल्लम के साथियों को(जलीलौक़द्र सहाबा को) देखा था। हनफ़ी मसलक तुर्की, भारतीय उपमहाद्वीप, मध्य एशिया आदि में अधिक प्रचलित है।

इमाम मालिक : (जन्म 711 ईस्वी, मृत्यु 795 ईस्वी)  वे मदीना के एक प्रमुख विद्वान थे, और उन्होंने हदीस और फिक़्ह पर महत्वपूर्ण काम किया। इमाम मालिक र अ  ने मुवत्ता नामक प्रसिद्ध हदीस संग्रह लिखा है।इनके अनुयायी मालिकी कहलाते हैं, और उनको मानने वाले अफ्रीका, मग़रिब (मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनिशिया, लिबिया) और कुछ अरब देशों में ज्यादा पाये जाते हैं।

इमाम शाफ़ई : (जन्म 767 ईस्वी, मृत्यु 820 ईस्वी) इनके मानने वाले शाफ़ई कहलाते हैं। वे इमाम मालिक के शिष्य थे, और उन्होंने फिक़्ह के सिद्धांतों को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।   मिस्र, यमन, पूर्वी अफ्रीका (सोमालिया, केन्या), इंडोनेशिया, मलेशिया आदि में  शाफ़ई मसलक ज़्यादा  प्रचलित है।

इमाम अहमद इब्न हंबल : (जन्म 780 ईस्वी, मृत्यु 855 ईस्वी) इन्हें मानने वाले हम्बली कहलाते हैं।  इमाम हम्बली , इमाम शाफ़ई के शिष्य थे, और इन्होंने हदीस और फिक़्ह पर बहुत अधिक ध्यान दिया। इन्होंने  मुस्नद अहमद नामक प्रसिद्ध हदीस संग्रह संकलित किया।  उनके अनुयायी हम्बली कहलाते हैं। हम्बली मसलक  के मुस्लिम  सऊदी अरब और खाड़ी देशों में ज्यादा पाये जाते हैं।

ईस्वी सन 699, 711, 767और 780 में जन्म तथा 767, 795, 820और 855 तक लगभग 82 वर्षों के दौरान  चारों इमामों का जन्म हुआ  और  89 वर्षों की  अवधि  में  चारों इमामों ने फिक़्ह और उसूलों पर काम भी किया  और  इस्लामी न्यायशास्त्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कुरान और हदीस  (हुज़ूरेपाक मोहम्मद सल्लललाहोअलैवसल्लम ने जो कहा और जो किया वो सभी हदीस है) के आधार पर कानूनी नियमों और सिद्धांतों को विकसित किया। उनके द्वारा स्थापित फिक़्ह और इस्लामिक उसूलों  ने दुनिया भर के मुसलमानों के जीवन को प्रभावित किया है, और आज भी उनके विचारों का अध्ययन और पालन किया जाता है।

चार इमामों के बीच अंतर:

हालांकि चारों इमाम सुन्नी इस्लामी जगत के लिए  मान्य हैं,  फिर भी  चारों इमामों की बातों में कुछ अंतर हैं। ये अंतर कानूनी पद्धति और तर्क में  भिन्नता के कारण हैं।  इसके बावजूद ये सभी  फर्क   कानूनी  तौर सही माने जाते हैं। यानी चारों इमामों की बातों में अंतर होते हुए भी चारों इमाम की बातों को सही और इस्लाम के उसूलों के मुताबिक माना जाता है। किसी भी इमाम के फतवों और उसूलों को ग़लत नहीं माना जाता  और कभी भी किसी भी इमाम ने आपस में किसी भी इमाम की बातों को ग़लत होने की बात कभी नहीं कही । यानी इमाम अबू हनीफा र अ की कही बात किसी भी अन्य  इमाम ने ग़लत नहीं बताई और इसी तरह दूसरे इमामों की कही कोई बात ग़लत होना  बताया। आज के मौजूदा दौर में मुस्लिम जगत को यह बात जानना ज़रूरी है। मुस्लिम औलमा ए दीन , मौलवियों और मुफ्तियों को यह बात कि इस्लाम के इमामों ने आपस में किसी भी इमाम की बातों को  ग़लत नहीं बताया है , बताया जाना चाहिए।   यह महत्वपूर्ण  तथ्य   मुस्लिम  जगत के नौजवानों  में खासतौर पर फैलाया   जाना ज़रूरी है ताकि किसी भी  किस्म  का आपसी इख़्तिलाफात इस्लाम के मानने  वालों में  ना हो। “क्या चारों इमामों को एक साथ माना जा सकता है?” यह एक मज़हबी मामूली सवाल नहीं है। इसका जवाब है, हाँ,  लेकिन कुछ  खास शर्तों के साथ । कोई भी व्यक्ति अलग-अलग इबादत या लेनदेन के लिए अलग-अलग  इमामों का पालन कर सकता है , जैसे एक व्यक्ति नमाज़ के लिए हनफ़ी उसूलों का पालन कर सकता है और हज के लिए हंबली उसूलों का । इसी तरह मिसाल के तौर पर ज़कात के लिए हनफ़ी नियम का पालन करना और वुज़ू के लिए शाफ़ई नियम का पालन करना ।   एक नमाज़ी जो विपरीत लिंग के फर्द को छूने  से वुज़ू टूटने के शाफ़ई नियम को  नहीं  मानता और खून बहने से वुज़ू टूटने के हनफ़ी नियम को भी नहीं मानता । मगर  जब कोई व्यक्ति सिर्फ अपनी सहुलियत के लिए अलग-अलग नियमों (उसूलों) को चुनता और मिलाता है, तो वह धार्मिक कर्तव्य के बजाय अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का पालन करता है। इस तरह का व्यवहार इस्लामी कानून के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है ।  इस  नज़रिए से, तल्फ़ीक़(मिलाना, मिक्स करना) को “धर्म के साथ खिलवाड़” माना गया है ,क्योंकि  इससे दीनी ईमान कमज़ोर होता है , लेकिन बहुत से उलमा (जैसे इमाम नववी, इब्नुल क़ैयिम, शौक़ानी रहिमहुमुल्लाह वग़ैरह) ने कहा है कि किसी मुसलमान के लिए एक मसले में एक इमाम और दूसरे मसले में दूसरे इमाम की बात लेना , मानना जायज़ है, अगर वह दलील की बुनियाद पर हो। अगर कोई शख़्स यह सोचकर मसलक बदलता है कि “मुझे कौन सा हुक्म ज़्यादा सहीह हदीस या दलील के क़रीब लगता है”  तो यह जायज़ है, लेकिन अगर कोई यह सोचकर बदलता है कि “कहाँ आसानी मिलती है, कौन सा हुक्म मेरे नफ़्स को आराम देता है” → यह हवस की पैरवी है, और हवस की पैरवी को क़ुरआन ने मना किया है। मुसलमानों में फिरके  इमामों ने नहीं बनाए, बल्कि ये तारीखी, सियासी, और मज़हबी इख़्तिलाफात की  वजह से बने हैं। इमामों का काम रहनुमाई करना  था, लेकिन उनके बाद उनके   मानने वालों  ने उनकी शिक्षाओं और व्याख्याओं को अलग-अलग तरीकों से समझा, जिससे अलग-अलग समूह बन गए। इस तरह कह सकते हैं कि मुसलमानों में इमामों ने फिरके  नहीं बनाए। सबसे पहले शिया और सुन्नी फिरके बने जिसका कारण सियासी रहा। इसी तरह इमामों ने कुरान और हदीस की तफसीर, तशरीह और वजाहत  करने के तरीकों में फर्क  होने से भी कई फिरके बने।  फलसफे, फ़िक्र और नज़रिए के एतबार से भी फिरके बने हैं।  फ़ज़लुर्रहमान

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