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जिनपिंग की सीक्रेट चिट्ठी से सुधरे भारत-चीन रिश्ते

नई दिल्ली

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ट्रम्प टैरिफ संकट ने बदली कूटनीति

नई दिल्ली/बीजिंग (एजेंसी)।  भारत और चीन के रिश्ते हमेशा से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। कभी सीमा विवाद और सैन्य तनाव की वजह से दोनों देशों में खटास दिखती है, तो कभी व्यापारिक साझेदारी और वैश्विक कूटनीति उन्हें करीब लाने की कोशिश करती है। हाल ही में ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने इस संबंध में एक नया खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक सीक्रेट चिट्ठी लिखी थी, जिसमें उन्होंने अमेरिका की नीतियों, खासकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ फैसलों से चीन को होने वाली मुश्किलों का ज़िक्र किया था।

ट्रम्प का टैरिफ और चीन की परेशानी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने कार्यकाल में चीन के खिलाफ बड़े स्तर पर ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) छेड़ा था। उन्होंने चीनी आयात पर भारी टैरिफ लगाए, जिससे बीजिंग की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया। ट्रम्प की रणनीति चीन की आर्थिक ताकत को चुनौती देने की थी, लेकिन इसका असर वैश्विक व्यापार पर भी पड़ा। इसी दौरान चीन ने भारत को एक अहम साझेदार के तौर पर देखना शुरू किया। बीजिंग को समझ में आया कि अगर अमेरिका का दबाव लगातार बढ़ता है, तो उसे अपने पड़ोसियों और बड़े बाजारों वाले देशों से संबंध सुधारने होंगे।

राष्ट्रपति मुर्मू को लिखी चिट्ठी

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, जिनपिंग ने राष्ट्रपति मुर्मू को जो चिट्ठी लिखी, उसमें उन्होंने दो मुख्य बातें कहीं— अमेरिका की आक्रामक नीतियों से चीन पर गंभीर असर पड़ रहा है। भारत और चीन अगर आपसी मतभेदों को किनारे रखकर सहयोग करें, तो दोनों देशों के हित सुरक्षित रह सकते हैं। यह चिट्ठी एक तरह से बीजिंग का “शांतिपूर्ण संदेश” थी, जिसमें भारत को भरोसेमंद साझेदार मानने का संकेत दिया गया।

गुपचुप कूटनीति की शुरुआत

रिपोर्ट बताती है कि मार्च में, जब ट्रम्प का टैरिफ विवाद चरम पर था, उसी समय बीजिंग ने नई दिल्ली से गुपचुप चैनल्स के ज़रिए संपर्क साधना शुरू कर दिया था। यह कोई आधिकारिक घोषणा नहीं थी, बल्कि बैकडोर डिप्लोमेसी थी, जो धीरे-धीरे रिश्तों को नया मोड़ देने लगी। भारत के लिए भी यह समय अहम था। एक तरफ अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक संबंध मजबूत हो रहे थे, वहीं चीन से दूरी बढ़ना एशिया में अस्थिरता पैदा कर सकता था। ऐसे में भारत ने इस संवाद का स्वागत किया।

मोदी का चीन दौरे का प्लान

जिनपिंग की चिट्ठी और बैकडोर बातचीत का असर यह हुआ कि कुछ ही महीनों में रिश्तों में सकारात्मक माहौल बनने लगा। दोनों देशों ने कई मुद्दों पर बातचीत शुरू की और धीरे-धीरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन दौरा तय हुआ। मोदी के दौरे का मकसद यह दिखाना था कि भारत और चीन केवल सीमा विवाद में उलझे नहीं हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता में भी उनकी साझा भूमिका है।

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भारत-चीन रिश्तों पर असर

इस चिट्ठी और उसके बाद हुई घटनाओं से कुछ बड़े असर देखने को मिले— विश्वास बहाली की शुरुआत: लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच एक सकारात्मक संदेश ने भरोसे का माहौल बनाया। व्यापार में संभावना: चीन ने संकेत दिया कि वह भारत को एक भरोसेमंद व्यापारिक सहयोगी के रूप में देखना चाहता है। अमेरिका को संदेश: यह घटनाक्रम अमेरिका को भी अप्रत्यक्ष संदेश था कि चीन अकेला नहीं है, वह भारत जैसे बड़े पड़ोसी देशों को अपने साथ ला सकता है।

चुनौतियां अब भी बाकी

हालांकि यह सच है कि जिनपिंग की सीक्रेट चिट्ठी ने रिश्तों को सुधारने का रास्ता खोला, लेकिन भारत-चीन संबंध आज भी पूरी तरह सहज नहीं हैं। सीमा विवाद, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और भारत का अमेरिका के साथ बढ़ता गठजोड़, यह सब ऐसे मुद्दे हैं जो भविष्य में नई चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं। भारत-चीन रिश्तों का यह नया अध्याय बताता है कि कूटनीति में कई बार एक सीक्रेट चिट्ठी या बैकडोर बातचीत भी बड़े बदलाव ला सकती है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट ने यह साफ किया है कि जिनपिंग ने ट्रम्प की आक्रामक नीतियों से परेशान होकर भारत का रुख किया। इसी के बाद मोदी का चीन दौरा प्लान हुआ और रिश्तों में सुधार की कोशिशें तेज हुईं। यह पूरी कहानी इस बात की गवाही देती है कि वैश्विक राजनीति में कोई भी देश स्थायी दुश्मन या स्थायी दोस्त नहीं होता। हालात बदलते ही रिश्तों की दिशा भी बदल जाती है। भारत और चीन, दोनों की मजबूरी और ज़रूरतें ही इन्हें बार-बार एक-दूसरे के करीब लाती और दूर करती हैं।

 

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