आखिर मुसलमान इंसाफ की उम्मीद किससे रखें ?
आज देश में मुसलमान होना ही एक तरह का जुर्म हो गया है। सत्ता में बैठे लोग उनके खिलाफ नफरत फैला रहे हैं I न्यायपालिका सहित सभी संवैधानिक संस्थाएं खामोश हैं? ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मुसलमान इंसाफ की उम्मीद किससे रखें। यह सब सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि भाजपा शासित राज्यों की सरकारें लगातार मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों को छीन रही है। उनको हाशिये पर धकेल रही है। इस बार स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हो हुए तो प्रधानमंत्री मोदी जी ने सारी स्थापित परंपराओं को दर किनार कर दिया। उन्होंने संघ को विश्व का सबसे बड़ा एनजीओ बताते हुए उसे देश सबसे बड़ा देश भक्त संगठन घोषित कर दिया। यह वह संगठन है जिसका देश की आजादी में कोई योगदान नहीं था और मुसलमानों के खिलाफ इस संगठन की नफरत किसी से छुपी हुई नहीं है। इस संगठन के दूसरे संघ सरचालक गुरु गोवलकर ने एक पुस्तक “द बंच ऑफ थोट” लिखी थी। जिसमें उन्होंने खुलकर देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की घोषणा की थी। उसी में उन्होंने बताया था कि हिंदू राष्ट्र कैसा होगा। उस राष्ट्र में मुसलमानों और ईसाई के लिए क्या व्यवस्था होगी। गुरु गोवलकर हिंदू राष्ट्र बनाने में चार बाधाएं मानते थे एक मुसलमान दूसरे वामपंथी और तीसरे ईसाई चौथे दलित। सबसे पहले उन्होंने वामपंथियों को निशाना बनाया और धीरे-धीरे उसे खत्म कर दिया। ले देकर कुछ वामपंथी केरल में बचे हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी भूमिका को नष्ट कर दिया। फिर दलितों पर फोकस किया और जो दलित इस देश का मूल निवासी था। उसके एक बहुत बड़े हिस्से का हिंदुकरण करने में संघ कामयाब रहा। यह वही दलित वर्ग है जो धार्मिक जुलूसों में मस्जिदों के सामने नाच रहा है। दरगाहों और मस्जिदों में तोड़फोड़ करके व उन पर भगवा झंडा फहरा रहा है। कावड़ यात्रा में मुसलमानों पर हमले कर रहा है। यानि दलितों वाला रोड़ा हटाने में भी संघ कामयाब हो गया I अब बच रहे मुसलमान और ईसाई तो पहली बार ईसाइयों की संख्या कम है और उन्होंने लगभग समर्पण भी कर दिया है। जिन्होंने नहीं किया उनके साथ मणिपुर कांड किया गया और मैसेज दिया कि समर्पण कर दो अन्यथा मणिपुर जैसा कांड अन्य ईसाई बहुल राज्यों में भी दोहराया जा सकता है। अब बच रहे हैं मुसलमान जो देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। इसलिए यह हिंदू राष्ट्र के सपने में सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए भाजपा शासित राज्यों में लगातार इनको निशाना बनाया जा रहा है, ताकि यह भी समर्पण कर दें, बंगाल में क्योंकि भाजपा की सरकार नहीं है तो बांग्ला भाषी मुसलमानों को भाषा के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है। जो भी मुसलमान बांग्ला भाषी है उसे बांग्लादेशी बताकर अवैध घुसपैठिया बताकर यातनाएं दी जा रही हैं । सवाल यह है कि सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्र सरकार और केंद्रीय एजेंसियों की होती है और ग्यारह साल से तो केंद्र में भाजपा की सरकार है। फिर अवैध बांग्लादेशियों की घुसपैठ कैसे हुई ? अगर हुई तो फिर केंद्र की सरकार और केंद्र की एजेंसियां क्या कर रही थीं ? लेकिन इस सवाल का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है। उनका मकसद सवाल का जवाब देना भी नहीं है। उनका मकसद है मुसलमानों को परेशान करना और उनकी नागरिकता छीनना। क्योंकि गोवलकर के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना में स्पष्ट किया था कि मुसलमान और ईसाई इस देश में रह सकते हैं। लेकिन उनका कोई नागरिक अधिकार नहीं होगा। वोट डालने का अधिकार भी नहीं होगा यानि हिंदुओं के रहमो करम पर इस देश में रह सकते हैं और भाजपा की सरकारें देश के मुसलमानों के लिए ऐसे ही हालात पैदा करने में लगी हुई हैं । बात करते हैं भाजपा शासित राज्य सरकारों की I महाराष्ट्र की सरकार ने सावन के महीने में सारे मीट की दुकान बंद करवा दी, जिससे हजारों मुसलमानों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। कानून बनाकर मस्जिदों पर माइक से अजान पर पाबंदी लगा दी। असम का मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा को संविधान की परवाह ही नहीं है। वह संविधान का धत्ता बताते हुए खुले आम देश को हिंदू राष्ट्र बता रहा है और न्यायपालिका में हिम्मत नहीं हुई कि कैसे वे खुले आम संविधान विरोधी कार्य कर रहे हैं। क्योंकि संविधान के अनुसार तो भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। असम में मुख्यमंत्री ने लगभग राज्य के चार सौ मदरसे बंद करवा दिए। इतना ही नहीं बरसात में बीस हजार मुस्लिम परिवारों के घरों पर बुलडोजर चला दिया और बरसात में खुले में ला पटका। लेकिन दूसरी तरफ मुख्यमंत्री ने एक जिले की 9000 एकड़ जमीन उद्योग लगाने के लिए मुफ्त में अडानी को दे दी और इस अन्याय के खिलाफ किसी भी संवैधानिक संस्थान ने अब तक कोई कार्यवाही नहीं की है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी तो उत्तराखंड को ही मुस्लिम मुक्त बनाना चाहता है। वहां लगातार दरगाहों को हटाया जा रहा है, मस्जिदों को तोड़ा जा रहा है। अब तो मुख्यमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि वह उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड को बंद कर रहे हैं। यानि स्कूल आप खोलेंगे नहीं और मदरसा बोर्ड को बंद कर देंगे तो सीधा सवाल उठता है कि आप मुसलमान बच्चों से शिक्षा हासिल करने का अधिकार छीन लेना चाहते हैं। धार्मिक शिक्षा हासिल करना उनका संवैधानिक अधिकार है। पुष्कर धामी उस अधिकार को छीन लेना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी जी का तो जवाब ही नहीं है। उन्होंने राज्य की हजारों स्कूलों को बंद कर दिया है। लगातार मदरसों को बंद कर रहे हैं I उनकी राज्य के विकास या कानून व्यवस्था सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनका विकास मॉडल है जिन शहरों का नाम मुसलमानों के नाम पर है उनके नाम बदले जा रहे हैं। चाहे इलाहाबाद हो या मुगल सराय हो उनके नाम बदल दिए गए हैं। कावड़ यात्रा पर मुस्लिम दुकानदारों को लगातार परेशान किया जा रहा है। हर राज्य में चारागाह भूमि होती है, उत्तर प्रदेश में भी है और इस भूमि पर कब्जा करने में सभी समुदाय के लोग शामिल हैं। लेकिन योगी जी की सरकार ने आदेश निकाला कि जिस चारागाह भूमि पर यादवों और मुसलमानों ने कब्जा कर रखा है उसका अतिक्रमण हटाया जाए और अतिक्रमण करने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए । जब आदेश राष्ट्रीय मुद्दा बना तो योगी जी को मजबूर होकर यह भेदभाव पूर्ण आदेश वापस लेना पड़ा है। योगी जी का एक आदेश आज कल बहुत चर्चा में है मुरादाबाद के मुस्लिम बैंड वालों को आदेश दिया गया है कि यदि उनके बैंड का नाम हिंदू देवी देवता जैसे शिव बैंड या श्री बैंड जैसा है तो फौरन उसे हटाए और बैंड का मुस्लिम नाम रखें। यह है उत्तर प्रदेश के योगी जी का विकास मॉडल । राजस्थान हमेशा से एक शांत प्रदेश रहा है, लेकिन अब इसको भी अशांत करने के प्रयास शुरू हो गए हैं। यहां भी धार्मिक जुलूसों, मस्जिदों के आगे नाच गाने शुरू हो गए हैं। चिकित्सा जिसको सेवा का काम माना जाता है। इसमें भी साम्प्रदायिकता को घुसाया जा रहा है। गत दिनों टोंक में एक मुस्लिम ट्रेनी चिकित्सक के हिजाब को लेकर एक सीनियर हिंदू डॉक्टर ने बखेड़ा खड़ा कर दिया। पूरे शहर को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने का प्रयास हुआ। जयपुर में तो एक विधायक है हवामहल से वे जब से चुनाव जीते हैं तब से कोशिश कर रहे हैं कि कैसे जयपुर का आपसी भाईचारा खत्म हो। वह हमेशा खुद को संविधान से ऊपर समझते हैं। कभी वह मुसलमानों की मीट होटल में चेक करने चले जाते हैं। कभी शियाओं के इमामबाड़े के कागज चेक करने चले जाते हैं। कभी मुसलमानों के आधार कार्ड चेक करने चले जाते हैं। इस बार तो उन्होंने सारी हदें पार कर दी। शिक्षाविदों के प्रोग्राम में मुंबई से आये एक मुस्लिम शिक्षाविद से जबरन भारत माता की जय और वंदे मातरम बुलवाने लगे और जब शिक्षाविद ने नहीं बोला तो विधायक ने वहां भीड़ को ऐसा उकसाया कि वहां मॉबलिचिंग जैसे घटना घट सकती थी। इस सारे मामलों के बावजूद देश की न्यायपालिका सहित सभी संवैधानिक संस्थाएं खामोश हैं । ऐसे में यह सवाल उठाना लाजमी है कि आखिर मुसलमान किस से इंसाफ की उम्मीद रखें ?
-डॉ. एस. खान
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