रोज़ी की चिंता: एक सोचने वाला पैग़ाम
आज हर इंसान को एक बात बेहद परेशान करती है — और वो है रोज़ी की चिंता। चाहे कोई अमीर हो या ग़रीब, हर कोई या तो कमी से डरता है या फिर अपने पास मौजूद माल के खो जाने से। लेकिन क़ुरआन और हदीस की रौशनी में जब हम इसे समझते हैं, तो हमें मालूम होता है कि असल में चिंता का नहीं, तवक़्कुल (भरोसे) का रास्ता अपनाना चाहिए।
क़ुरआन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है (सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ 43:33-35) कि अगर यह डर न होता कि लोग काफ़िर बन जाएँगे, तो अल्लाह कुफ्र करने वालों के लिए उनके घरों की छतें, सीढ़ियाँ और ज़ेवर सोने-चाँदी के बना देता। लेकिन यह सब दुनिया का फ़ानी सामान है — असल इनाम तो आख़िरत में है, जो अल्लाह से डरने वालों के लिए है।
आज हम यह नहीं सोचते कि जो कुछ हमारे पास है, वो भी अल्लाह की नेमत है। जब हम अपनी सेहत और वक़्त को बर्बाद करते हैं, तो एक बड़ी दौलत खो देते हैं — जैसा कि आया है:
“दो नेमतें ऐसी हैं जिन्हें लोग अक्सर ज़ाया कर देते हैं — एक सेहत और दूसरी वक़्त।”
दुनिया की चमक दमक के पीछे भागते हुए हम यह भूल जाते हैं कि असली मक़सद आख़िरत की तैयारी है। आख़िरी पैग़म्बर का वाक्या है की वो एक मर्तबा अपने साथियों के साथ गुजर रहे थे तभी उनकी नज़र मरे हुए बकरी के बच्चे नज़र पड़ी तो उन्होंने इस की मिसाल दी और फ़रमाया कि दुनिया की हैसियत अल्लाह के नज़दीक इससे भी कमतर है।
हमेशा यह बात याद रखिए:
“मोमिन के लिए दुनिया एक क़ैद है और काफ़िर के लिए जन्नत।”
जो तकलीफ़ें रास्ते में आती हैं, वो इस बात का सबूत हैं कि आप जन्नत की तरफ़ बढ़ रहे हैं। अल्लाह ने जन्नत को मुसीबतों से और जहन्नम को ख्वाहिशों से ढक रखा है। यानी जिस राह में सब कुछ आसान हो, वो जरूरी नहीं कि सही हो।
क़ुरआन हमें चेतावनी देता है (सूरह आला 87:16-17):
“बल्कि तुम दुनिया को तरजीह देते हो, जब कि आख़िरत बेहतर और हमेशा रहने वाली है।”
क़यामत के दिन एक झलक जहन्नम की — सारी दुनिया की लज़्ज़तें भुला देगी, और एक झलक जन्नत की — सारी तकलीफ़ें भुला देगी । यही हमारे ग़म और खुशी की असल हैसियत है।
रोज़ी की फिक्र छोड़ो, मेहनत और हलाल का रास्ता अपनाओ। तवक़्कुल रखो, आख़िरत की तैयारी करो, और अल्लाह पर यक़ीन रखो — क्योंकि रोज़ी देने वाला वही है, और कामयाबी भी उसी के पास है।
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