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इस्लाम में औरतों के हक़: 1400 साल पुरानी रौशनी

Jaipur

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इस्लाम को अक्सर औरतों के हक़ से जोड़कर देखा जाता है—कभी तारीफ में, तो कभी आलोचना में। मगर हक़ीक़त ये है कि इस्लाम वो पहला धर्म था जिसने औरतों को एक मुकम्मल इंसान की हैसियत दी, ना कि किसी की जायदाद या बोझ की तरह। 1400 साल पहले, जब औरतें ज़िंदा दफ़्न कर दी जाती थीं, इस्लाम ने उन्हें इज़्ज़त, बराबरी और हक़दार बनाया।

इस्लाम के नज़रिए से औरत की पहचान

इस्लाम का पैग़ाम साफ़ है: औरत और मर्द दोनों इंसानियत में बराबर हैं। अल्लाह ने दोनों को अलग-अलग खूबियाँ और जिम्मेदारियाँ दी हैं, मगर किसी को दूसरे से कमतर नहीं बनाया।

  • इज़्ज़त और बराबरी

इस्लाम सिखाता है कि औरत को आदर और सम्मान मिलना चाहिए। उसे अपनी मर्ज़ी से सोचने, फैसले लेने और समाज में हिस्सेदारी का पूरा हक़ है।

  • सामाजिक हक़ बीवी के तौर पर

इस्लाम में औरत को शादी से पहले अपनी मर्ज़ी से जीवनसाथी चुनने का हक़ है। शादी के बाद, वो ‘मेहर’ की हक़दार होती है और अगर ज़रूरत हो तो तलाक़ भी ले सकती है। पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने कहा:

“तुम में सबसे बेहतर वह है जो अपनी बीवी से अच्छा बर्ताव करे।”

  • मां के तौर पर

मां को इस्लाम में सबसे ऊँचा दर्जा दिया गया है। हदीस में है:

“जन्नत मां के कदमों के नीचे है।”

  • बेटी और बहन के तौर पर

इस्लाम ने बेटियों को ज़िंदा दफ्न करने की रस्म को न सिर्फ रोका, बल्कि बेटियों की परवरिश को जन्नत का ज़रिया बताया। बहनों को भी विरासत में हिस्सा दिया गया।

आर्थिक हक़

इस्लाम ने औरतों को माली आज़ादी दी है। वह अपनी जायदाद रख सकती है, कारोबार कर सकती है और नौकरी कर सकती है।

हज़रत ख़दीजा (र.अ.) – तिजारत में माहिर

हज़रत आयशा (र.अ.) – इल्म की मिसाल

हज़रत रुफैदा (र.अ.) – पहली मुस्लिम नर्स

हज़रत उम्म-ए-अम्मारा (र.अ.) – जंग में हिस्सा लेने वाली बहादुर महिला

इस्लाम में औरत को विरासत और मेहर दोनों का हक़ है। उसका माल सिर्फ उसका होता है—ना बाप, ना भाई, ना शौहर उसमें दख़ल दे सकते हैं।

राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी

इस्लाम ने औरतों को समाज और राजनीति में हिस्सा लेने का हक़ दिया। पैग़म्बर के दौर में औरतों ने ‘बयअत’ दी, सलाह-मशवरा किया और यहां तक कि हुकूमत भी चलाई।मशहूर मुस्लिम लेखिका फ़ातिमा मर्निस्सी ने लिखा कि इस्लाम में कई महिलाओं ने रियासतें चलाईं—यह इस बात का सबूत है कि औरत सिर्फ घर की नहीं, समाज की भी रहनुमा है।

इल्म और दीन में औरत की भागीदारी

कुरआन की पहली आयत ही पढ़ने का हुक्म देती है—मर्दों और औरतों दोनों के लिए। इस्लाम में औरत को इल्म हासिल करना फर्ज़ है।हज़रत उम्म-ए-सलमा और फ़ातिमा बिन्त क़ैस जैसी महिलाओं ने फतवे दिए और समाज में दीन की रहनुमाई की। इस्लाम ने औरत को सिर्फ हक़ नहीं दिए—बल्कि उसे वह मुकाम दिया जो उस वक़्त किसी और समाज ने नहीं दिया था। जहां औरतें ज़िंदा दफ्न की जाती थीं, वहीं इस्लाम ने उन्हें जन्नत का रास्ता बताया।

हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) ने आखिरी खुत्बे में फरमाया:

“औरतों के बारे में अल्लाह से डरो।” आज ज़रूरत है कि इस्लाम की असल तालीमात को समझा जाए, और औरतों के हक़ को उनकी असली रूह में लागू किया जाए—ताकि नाइंसाफ़ी, ज़ुल्म और अज्ञानता का ख़ात्मा हो सके।

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