क्या शिक्षा मंत्री इस्तीफा देंगे?
झालावाड़ जिले में जर्जर सरकारी स्कूल भवन के गिरने से हुई 7 बच्चों की मौत की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए प्रदेश के शिक्षामंत्री मंत्रिमंडल से इस्तीफा देंगे? जबकि विपक्ष लगातार शिक्षा मंत्री के इस्तीफा की मांग कर रहा है। वैसे शिक्षा मंत्री मदन दिलावर 7 बच्चों की हत्या की नैतिक जिम्मेदारी तो ले रहे हैं लेकिन पद नहीं छोड़ना चाहते हैं। शिक्षा मंत्री ने सैकड़ो स्कूलों को जाकर देखा है लेकिन उन्होंने कभी बच्चों की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया। शिक्षा मंत्री का ध्यान तो केवल पाठ्यक्रमों में इतिहास बदलने और स्कूलों में मुस्लिम टीचरों को नमाज पढ़ने से रोकने पर ज्यादा था। सरकारी स्कूलों में ज्यादातर दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक एवं गरीब वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। इसलिए मौत की घटना के कुछ दिन तक सरकारी सिस्टम द्वारा जांच, मुआवजा, इलाज कुछ लोगों की जिम्मेदारी बताकर सस्पेंड जैसी कार्यवाही की जाएगी। 7 बच्चों की मौत के बाद भी 5 टीचरों को सस्पेंड कर दिया गया। जबकि इस घटना में टीचरों की क्या गलती है? शिक्षा मंत्री को अपने विभाग में शिक्षा के स्तर, स्कूलों के भवनों की स्थिति, टीचरों की कमी एवं स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर एक महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री हैं। मंत्री की क्या जिम्मेदारी है उनको पता होना चाहिए। वर्तमान शिक्षा मंत्री शिक्षा के अलावा दूसरे विषय पर भाषण बाजी करते रहते है। राजस्थान प्रदेश में जबसे शिक्षा मंत्री बने हैं शिक्षा में कितना सुधार हुआ है सभी जानते हैं। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर क्या यह नहीं जानते हैं कि प्रदेश के हजारों स्कूल बिल्डिंगों की जर्जर स्थिति है, जिनमें कभी भी हादसा हो सकता है। लेकिन सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों की किसी को चिंता नहीं है। क्योंकि सरकारी स्कूलों में किसी मंत्री, विधायक, आईएएस आईपीएस, आरएएस, आरपीएस एवं जजों के बच्चे नहीं पढ़ते हैं। सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति का कारण भी यही है। सांसदों एवं विधायकों को 5 वर्ष में करोड़ों का फंड मिलता है। लेकिन यह फंड कितना स्कूलों के बिल्डिंग या स्कूलों के अन्य कार्य में काम आता है सभी जानते हैं। झालावाड़ के स्कूल में 7 बच्चों की मौत को गंभीरता से लेकर दोषियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए और सजा मिलनी चाहिए। यदि एक बार दोषियों को सजा मिल गई तो फिर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी। सरकार, विभाग एवं जिम्मेदार अधिकारियों को जर्जर भवन की जानकारी थी। दो-तीन वर्ष पहले से ही ग्रामीणों ने भवन के जर्जर होने की जानकारी दी थी फिर कैसे कहा जा सकता है कि यह हादसा है? झालावाड़ जिले के इस स्कूल में यह हादसा नहीं यह 7 बच्चों की हत्या है। जिम्मेदारों पर हत्या का मुकदमा होना चाहिए। मंत्री और जिम्मेदारों को नैतिकता की जिम्मेदारी के नाम पर बचाना नहीं चाहिए। सात बच्चों की मौत के दोषियों को केवल इस आधार पर छोड़ देना कि बच्चे दलित, आदिवासी एवं गरीब परिवार के हैं? यदि ऐसा होता है तो ऐसे गरीब बच्चों के साथ हादसे होते रहेंगे और कानून और प्रजातंत्र के साथ खिलवाड़ होता रहेगा।
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