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मुसलमानों के लिए सफाई क्यूँ ज़रूरी है?

Jaipur

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हम ये सब जानते हैं कि बहैसियत मुसलमान अल्लाह तआला ने हम सबको अपनी इबादत के लिए पैदा किया है, जैसा कि अल्लाह तआला क़ुरआन में भी फ़रमाता है:

“और मैंने जिन्नों और इंसानों को सिर्फ़ अपनी इबादत के लिए पैदा किया है।”

अब यहां सवाल ये उठता है कि अगर मुसलमान हर वक़्त इबादत में मसरूफ़ रहेंगे तो दुनियावी ऐतबार से पीछे रह जाएंगे, और पीछे रहना तो छोड़िए, वो खुद अपनी ज़ाती ज़िंदगी में भी बहुत से कामों में पीछे रह जाएंगे।

लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। क्योंकि इबादत कहते हैं अपनी ज़िंदगी को अल्लाह सुब्हानहु तआला के बताए हुए अहकामात पर गुज़ारना — इसी को इबादत कहते हैं।  और इबादत में सबसे पहले जो ज़रूरी है और फ़र्ज़ है — वो है पाकी (साफ़-सुथराई)।  इसमें सबसे पहले है — अपना ईमान पाक हो।

वो कैसे पाक होगा?

वो तब होगा जब इस दिल में अल्लाह पर ईमान, उसका डर, और उसके आख़िरी पैगम्बर की मोहब्बत होगी। उसके बाद आता है — जिस्म का पाक होना, जिसमें हमें ग़ुस्ल सिखाया गया है। नहाते तो सब हैं, लेकिन इस्लाम ने हमें ग़ुस्ल का भी तरीक़ा सिखाया है। कपड़ों का पाक रहना, घर को साफ़ रखना — ये सब भी हमें सिखाया गया है। और हम ये सब करते भी हैं — अल्हम्दुलिल्लाह। लेकिन एक ऐसी ग़लती है जो हम में से अक्सर लोग करते हैं —

वो कौन सी?

वो है अपने घर के सामने, अपनी गली और मोहल्लों को साफ़ न रखना। जैसे कि आख़िरी पैगम्बर की हदीस है:  “ईमान का सबसे नीचला दर्जा यह है कि रास्ते से तकलीफ़ देने वाली चीज़ को हटा दिया जाए।”  (सहीह मुस्लिम 35)

अब मुझे आप बताइये,  अगर हम अपने घर के बाहर साफ़-सफ़ाई नहीं रखते, अपने मोहल्लों को साफ़ नहीं रखते —  तो वो कचरा, हमारे मोहल्ले या गली से गुज़रने वालों के लिए तकलीफ़ का सबब बनेगा।

बहैसियत मुसलमान —

हम ना तो किसी इंसान की तकलीफ़ का सबब बन सकते हैं,

बल्कि हमें तो उसकी तकलीफ़ भी दूर करनी चाहिए।

ये बहुत छोटी-छोटी बातें हैं जिन पर हम ग़ौर नहीं करते।

आज मुसलमानों के मोहल्लों का हाल हम सब जानते हैं।

लोगों से सुनने को मिलता है —

और अपने ही लोगों के मुँह से सुनने को मिलता है कि:

“अगर सबसे ज़्यादा कहीं गंदगी रहती है, तो वो मुसलमानों का मोहल्ला है।”

होना तो ये चाहिए कि

हम जिस तरह से अपने घर को,

अपने जिस्म को,

अपने ईमान को साफ़ रखते हैं —

ठीक उसी तरह हम अपने मोहल्लों को भी साफ़ रखें।

और जब कोई भी हमारा ग़ैर-मुस्लिम भाई हमारी गली या मोहल्ले से गुज़रे —

तो उसको एक बेहतरीन पैग़ाम जाए इस्लाम का और यहां के मुसलमानों का।

अल्लाह तआला हम सबको अपने हिफ़्ज़ व ईमान में रखे। (आमीन)

मोहम्मद सोहेल

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