Loading...

टीपू सुल्तान: एक सुल्तान जो धर्म से पहले इंसानियत का हामी था

jaipur

Follow us

Share

भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो वक़्त के साथ और भी रौशन हो जाते हैं। टीपू सुल्तान ऐसा ही एक नाम है, ‘शेर ए मैसूर’ जो अपने दौर में अंग्रेज़ हुकूमत के लिए खौफ़ का दूसरा नाम था। वो ना सिर्फ़ एक बहादुर योद्धा थे, बल्कि एक क़ाबिल प्रशासक, तकनीक-दोस्त नवाचारी, और मज़हबी रवादारी के हामी भी थे। टीपू सुल्तान के वालिद हैदर अली एक मामूली सिपाही थे, लेकिन अपनी क़ाबिलियत और जंग के हुनर से उन्होंने मैसूर की गद्दी हासिल की और खुद को सुल्तान घोषित किया। फ्रांसीसी फ़ौजियों से उन्होंने यूरोपीय जंग की तरकीबें सीखीं और एक नई तरह की फ़ौज खड़ी की। टीपू ने अपने वालिद के नक्शे-क़दम पर चलते हुए न सिर्फ़ अंग्रेज़ों से दो-दो हाथ किए बल्कि 1780 की पोलिलूर की लड़ाई में अंग्रेज़ों को उनकी सबसे बड़ी शिकस्त दी। इतनी बड़ी कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी इस हार को “सबसे शर्मनाक” कहा।

  • एक हुकूमत जो तरक्की की मिसाल बनी

1782 में जब टीपू सुल्तान तख़्त पर बैठे, उस वक़्त मैसूर तक़रीबन 80,000 वर्ग मील में फैला हुआ था। उसके भीतर 60 लाख से ज़्यादा लोग रहते थे। टीपू सुल्तान ने इसे सिर्फ़ एक हुकूमत नहीं, बल्कि एक ‘ख़ुदा की दी हुई जिम्मेदारी’ समझा और इसे “सरकार-ए-ख़ुदादाद” नाम दिया। उन्होंने हर विभाग पर खुद निगरानी रखी। चाहे वो खज़ाना हो, फ़ौज, खेती या तिजारत। उन्होंने कइयों को हैरत में डालते हुए नई फैक्ट्रियां खोलीं। हथियार, सिल्क, मिठाइयाँ, बारूद, यहाँ तक कि कैंडी और कटलरी तक बनाई जाती थी। उन्होंने सिल्क के लिए चीन से कीड़े और मोती निकालने वाले गोताखोर अरब से मंगवाए। टीपू सुल्तान ने बड़े-बड़े ज़मींदारों की मनमानी खत्म कर दी। उन्होंने वंशानुगत ज़मींदारी हटाकर ज़मीन गरीबों को दिलाई, जिससे खेती में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। शहर आबाद हुए, कारोबार फला-फूला। अंग्रेज़ तक मान गए कि “मैसूर सबसे अच्छी तरह से खेती किया गया और सबसे समृद्ध इलाक़ा था।”

  • मज़हबी एकता का पैग़ाम

जहाँ टीपू एक पक्के मुसलमान थे, वहीं उन्होंने कभी मज़हबी तंगनज़री को बढ़ावा नहीं दिया। उनके दरबार में कई ऊँचे पदों पर हिंदू अफसर थे। उन्होंने मंदिरों को ज़मीनें दीं, दान किया, और पूजा स्थलों को संरक्षण दिया। टीपू सुल्तान के नाम कई ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज़ मौजूद हैं, जिनमें उनके द्वारा मंदिरों को दिए गए तोहफों का ज़िक्र है। इतिहास की पुस्तकों और लेखों में जो तथ्य निकलकर आते हैं उनके अनुसार टीपू सुल्तान न सिर्फ एक वीर शासक था बल्कि उसने अपने शासन काल में कृषि-व्यवस्था में बड़े सुधार किए। यही नहीं, कई हिन्दू मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया जिसमें श्रृंगेरी मठ का नाम खासतौर पर लिया जाता है। इतिहास के जानकारों के मुताबिक, टीपू सुल्तान को न सिर्फ वीर योद्धा और राष्ट्रभक्त शासक के तौर पर जाना जाता है बल्कि धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक के तौर पर भी याद किया जाता है। सरकारी दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों पर नजर डालें तो टीपू ने श्रृंगेरी, नांजनगुंडा, श्रीरंगपट्टनम, कोलूर, मोकंबिका के मंदिरों को सरकारी खजाने से काफी धन और जेवरात दान दिए और इन्हें सुरक्षा मुहैया कराई थी।  टीपू के साम्राज्य में हिंदू बहुमत में थे और शायद अपने इन्हीं कार्यों के चलते वह काफी लोकप्रिय भी था। टीपू एक इल्म पसंद शख्स थे। उनके पास हज़ारों किताबों का कुतुबख़ाना था, जिसमें ख्वाब और ज्योतिष पर उनकी खुद की दो किताबें भी थीं। वो शायरी, तामीरात और फन के बड़े सरपरस्त थे। उन्होंने बाघ को अपनी सल्तनत का निशान बनाया और अपने तख़्त तक को सोने का बनवाया जिसमें बाघ की आकृतियाँ थीं।

  • दूरदर्शी सियासत और तकनीकी इनोवेशन

टीपू सुल्तान ने एक ऐसी चीज़ ईजाद की जिससे आज के ज़माने की मिसाइल तकनीक की बुनियाद मानी जाती है -रॉकेट। उनके बनाए रॉकेट अंग्रेज़ों के लिए नया खतरा बने। ब्रिटिश आर्मी ने बाद में उनके रॉकेट का मॉडल अपने पास रखा और उसी से प्रेरणा लेकर आगे के हथियार बनाए। टीपू ने अपनी हुकूमत के लिए तुर्की, ईरान और फ्रांस से राजनयिक संबंध बनाए। उन्हें खिलाफ़त-ए-उस्मानिया (ऑटोमन खलीफा) की तरफ से आधिकारिक मान्यता मिली कि वो खिलाफ़त की तरफ़ से हुकूमत कर सकते हैं।

  • आख़िरी लड़ाई और शहादत

1792 में अंग्रेज़ों ने मराठों और हैदराबादी निज़ाम के साथ मिलकर हमला किया। टीपू की आधी रियासत छीन ली गई। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 1799 में जब अंग्रेज़ों ने एक बार फिर हमला किया, तब उन्होंने श्रीरंगपट्टनम में आख़िरी सांस तक लड़ाई लड़ी और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। अंग्रेज़ों के हाथ में उनकी तलवार और खज़ाना तो आया, लेकिन उनका जज़्बा कभी नहीं जीत पाए। ब्रिटेन में टीपू की मौत पर जश्न मनाया गया। उनकी यादगार चीज़ें आज भी ब्रिटिश म्यूज़ियम में रखी हैं। जिनमें बाघ वाला ऑटोमेटिक खिलौना सबसे मशहूर है। कई लेखकों और शायरों ने टीपू से प्रेरणा ली। आज के दौर में देश में टीपू सुल्तान की विरासत पर सियासत होने लगी है। बीजेपी और हिंदुत्व संगठनों द्वारा उन्हें हिंदू-विरोधी कहा जा रहा है, जबकि वही बीजेपी 2015 तक उनकी जयंती मनाती थी और 2017 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें “आज़ादी के लिए लड़ने वाला पहला सच्चा हीरो” कहा था। अब उनके नाम पर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, ट्रेन, स्टैच्यू  सब पर बवाल हो रहा है, नाम बदले जा रहे हैं। जबकि असलियत ये है कि टीपू ने कभी मज़हबी भेदभाव नहीं किया। उनका इतिहास दस्तावेज़ों में आज भी दर्ज है।टीपू सुल्तान सिर्फ़ एक योद्धा नहीं थे, वो उस दौर का विज़नरी थे। जब बाकी रियासतें अंग्रेज़ों से समझौते कर रही थीं, टीपू अकेले उन्हें ललकार रहे थे। वो आख़िरी सांस तक अपनी मातृभूमि के लिए लड़े  और शहीद हो गए।

Disclaimer

Royal Patrika is an independent news portal and weekly newspaper. Content is published for informational purposes only. Royal Patrika does not take responsibility for errors, omissions, or actions taken based on published information.

Royal Patrika एक स्वतंत्र समाचार पोर्टल और साप्ताहिक समाचार पत्र है। यहां प्रकाशित सामग्री केवल सूचना के उद्देश्य से है। प्रकाशित जानकारी के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय, त्रुटि या नुकसान के लिए Royal Patrika जिम्मेदार नहीं होगा।