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हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का वाकिया

Jaipur

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हबीबुल्ला एडवोकेट

हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम अपने ज़माने के बादशाह थे। वह शहर बलख पर हुकूमत किया करते थे। उनकी सल्तनत एक बड़ी सल्तनत थी। लेकिन जब उन पर इश्क ए हकीकी का असर व ग़लबा हुआ तो बादशाही और सल्तनत ए बलख से उनका दिल उचाट हो गया और वह हरदम याद ए इलाही में मसरूफ रहने लगे। सलतनते शाही से उनके दिल के उचाट होने का वाक़िया यह है कि एक रात वोह अपने महल की छत पर सो रहे थे कि हक़तआला ने चन्द फरिश्तों को इन्सानी सूरत में उनके पास भेजा। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम शाही महल में रात के वक्त इन इंसानों की आहट पाकर दिल में सोचने लगे कि शाही महल में कुछ मुहाफिज़ों के होते हुए किसी इंसान की ऐसी हिम्मत और जुरअत नहीं हो सकती है। यह शायद जिन्नात में से हैं। आपने उन से दरयाफ्त फरमाया कि आप लोग यहां कैसे तशरीफ लाये है। इन आने वाले लागों ने फरमाया कि हम लोग अपने ऊटों की तलाश में फिर रहे हैं। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि ऊँट शाही महल की छत पर छलांग लगाकर कैसे आ सकते हैं? पस उन गै़बी इन्सानों (फरिश्तों) ने फरमाया बेशक ऊँट शाही महल की छत पर नहीं आ सकते लेकिन फिर तू शाही तख्त पर बैठ कर अल्लाह की तलाश में क्यूं मसरूफ है और क्यूं हर वक़्त यादे इलाही में हमातन डूबा रहता है। क्या शाही तख़्त पर बैठकर तू शहनशाह ए हक़ीक़ी तक पहुंच सकता है? यह कह कर वो फरिश्ते इब्राहिम अलैहिस्सलाम की नज़र से गायब हो गये।

हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के दिल पर फरिश्तों के कलाम से एक गहरी चोट लगी। सल्तनत से उनका दिल फिर गया और अल्लाह की मोहब्बत में सल्तनत का तख्तोताज सब छोड़ दिया और शाही महल से निकल कर अल्लाह के लिये गुरबत के साथ दोस्ती करली। अल्लाह की याद और उसकी बन्दगी में उनको एसा लुत्फ आने लगा कि वो शानो शोकत उनके दिल से खत्म हो गयी। उन्होंने यह ठान ली कि अल्लाह तआला की बन्दगी सुल्तानी से बेहतर है और अल्लाह पर जो हमारा महबूबे हक़ीक़ी है तख़्तो ताज और अपनी जान को कु़रबान कर देना हजारों सलतनतों और शाहाना ज़िन्दगीयों से बेहतर है। दुनिया की हजारों सल्तनतें अल्लाह की गुलामी पर कु़रबान कर देने पर भी उसकी नवाज़िशों और इनायतों और नेमतों का हक़ अदा नहीं हो सकता। इस कैफियत को मिर्जा़ गा़लिब ने अपने शेर में इस तरह बयान किया है।

  • जान दी हुई उसी की थी -हक़ तो है कि हक़ अदा ना हुआ

हक़ तआला जब किसी बन्दे को अपना बना लेते हैं तो उसकी मुजाहिदें में आधी जान ले लेते हैं और इसके एवज़ में सौ जान अता फरमाते हैं और एसी एसी नेमतें अता फरमातें हैं कि हमारे गुमान मे भी नहीं आ सकतीं। जब हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने सल्तनत छोड़ दी, अल्लाह तआला ने उनकी एसी क़दर फ़रमाई कि पहले वो सिर्फ एक महदूद सल्तनत बलख़ के मालिक थे अब उन्हें खुश्की (जमीन) और तरी (दरिया) पर हुकूमत नसीब हो गयी। अल्लाह तआला ने उन्हें वली और दोस्त बना लिया और जमाने में उनको कुतुब यानि औलिया अल्लाह के सरदार का दर्जा अता फरमाया।

एक रोज़ हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम दरिया के किनारे अपनी गुदड़ी सी रहे थे कि उनकी सल्तनत का एक वज़ीर उस तरफ से गुज़रा। वजी़र ने बादशाह को इस गुरबत में गुदड़ी सीते हुए देखा तो दिल में सोचा कि इन्होंने अपने तमाम शाहना ठाठबाट छोड़कर ओर हुकूमत शाही से दस्त बरदार होकर इस तंगदस्ती और फ़क़ीराना जिन्दगी को इख्तेयार किया है, नामालूम यह कैसी अक़लमन्दी है। अल्लाह तआला ने वजी़र के इस ख्याल को हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम पर मुनकसिफ (जाहिर) फरमाया। पस हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अपनी सुई दरिया में फेंक दी और हुक्म दिया कि ऐ मछलियों! मेरी सूई लाओ। इस हुक्म का सूनना था कि सौ हजा़र मछलियां सोने की सुई अपने-अपने लबों में दबाए हुये दरिया के किनारे हाज़िर होकर अर्ज़ करने लगीं कि हज़रत सुई हाज़िर है। हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ए अल्लाह में अपनी सुई चाहता हूं। पस इनता कहना था कि एक मछली वोह खास सुई लेकर हाज़िर हुई, जिसको हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने दरिया मे फेंका था। उस वक्त हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने उस वजीर से फरमाया कि “दिल की सल्तनत बेहतर है या मुल्क हक़ीर की” उस वक्त वजी़र ने एक सांस खींची और कि अफसोस दरिया की मछलियां तो इस अल्लाह वाले को पहचानती हैं और मैं इंसान होकर भी कुतुब ए जमा यानी जमाने के ओलिया अल्लाह के सरदार से बेखबर हूं। मैं इंसान होकर भी बदबख्त नसीब का हेटा और ना समझ हूं और यह मछलियां इस दोलते मारिफ़त के सबब मुझ से कहीं ज़्यादा खुशनसीब हैं। पस वज़ीर ने उस शाहदीन ओलिया अल्लाह के सरदार शाहे बलख़ यानी हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के सामने सराया अदब बनकर सलाम किया और रोता हुआ दोलत ए इश्क ए हकी़की़ से कामयाब होकर वापस हुआ। मोलाना रूमी रह. अ. ने इस मकाम एक नसीहत फरमाई जोकि फारसी में है जिसका तरजुमा यह है- “पस ए धुला हुआ चहरा रखने वाले यानी नामाक़ूल और नालायक़ तू किस गुमान में है यह हसद और जंग किन मुक़द्दस और पाकीज़ा नुफूस से करता है, रोशन ए तरीके हक़ से तू मुकाबला करता है, फरिश्तों से दौड़ में सबक़त करता है यानी अल्लाह वालों से बदगुमानी और हसद नहीं करना चाहिए क्योंकि औलिया को अल्लाह तआला की तरफ से बतौर करामात के ऐसी ताकत अता होती है कि कमान से निकले हुये तीर को भी वापस कर लेते हैं।  “माखूज अज़ कुतुब इलाहिया”

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