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इस्लाम में अदब और एहतराम की अहमियत

Jaipur

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हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ इंसानी रिश्तों की बुनियाद आपसी इज़्ज़त, अदब और मोहब्बत पर होती है। इस्लाम, जो इंसानियत को एक बेहतर ज़िंदगी का रास्ता दिखाता है, उसी इज़्ज़त और अदब को अपने उसूलों में एक अहम मक़ाम देता है। इस्लाम की नज़र में अदब (respect) महज़ एक अच्छा अख़लाक़ नहीं, बल्कि एक दीनी फ़र्ज़ है।

इज़्ज़त का असल हक़दार

इस्लाम बताता है कि इज़्ज़त सबसे पहले ख़ुदा (अल्लाह) का हक़ है। वही हमारा पैदा करने वाला है, उसी ने हमें ज़िंदगी के उसूल सिखाए। लिहाज़ा, सबसे पहले हमारा फ़र्ज़ है कि हम अल्लाह की इताअत करें, उसके हुक्मों पर चलें और उसके बताए रास्ते पर आगे बढ़ें। यही असली इज़्ज़त और अदब की पहली सीढ़ी है। “और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करे, और अल्लाह से डरे और उसका हक़ अदा करे — वही लोग कामयाब हैं।”
(क़ुरआन 24:52)

अदब सिर्फ अल्लाह के लिए नहीं

इस्लाम हमें सिखाता है कि अल्लाह के साथ-साथ तमाम इंसानों, जानवरों और क़ुदरत के लिए भी हमारा रवैया अदब और रहम से भरा होना चाहिए। किसी की इज़्ज़त को ठेस पहुँचाना, किसी की ग़लती को उछालना या दूसरों के ऐब तलाश करना इस्लाम की तालीम के ख़िलाफ़ है।

ग़ीबत और चुग़लख़ोरी – इज़्ज़त की तौहीन

आज के दौर में एक बड़ी बीमारी बन चुकी है – ग़ीबत (पीठ पीछे बुराई करना)। अक्सर लोग इसे मामूली बात समझते हैं, मगर इस्लाम में इसे मुर्दा भाई का गोश्त खाने जैसा संगीन गुनाह बताया गया है। “ऐ ईमान वालों! बहुत से शक़ों से बचो… और न एक-दूसरे की ग़ीबत करो। क्या कोई अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद करेगा?”
(क़ुरआन 49:12)। नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि एक इंसान अपनी ज़बान से निकले एक लफ़्ज़ की वजह से जन्नत से दूर और जहन्नम के क़रीब हो सकता है, अगर वो लफ़्ज़ किसी की तौहीन करता हो।

मुल्क, उम्मत और इंसानियत की बुनियाद – इज़्ज़त

किसी समाज की पहचान उसके आपसी ऐहतराम में होती है। इस्लाम कहता है कि दूसरों के लिए वही चाहो जो अपने लिए चाहते हो। यह सिर्फ एक उसूल नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों की बुनियाद है। आज जब मीडिया और सोशल मीडिया पर ग़ीबत और तौहीन का बाज़ार गर्म है, हमें यह याद रखने की ज़रूरत है कि हम अल्लाह के सामने ज़िम्मेदार हैं, अपनी ज़बान, अपने अमल और अपने रवैये के लिए।

रहमत का दरवाज़ा हमेशा खुला है

इस्लाम सख़्ती नहीं, बल्कि रहमत का मज़हब है। अगर कोई इंसान ग़लती करे, ग़ीबत में पड़ जाए या किसी की इज़्ज़त को नुक़सान पहुँचाए, तो सच्चे दिल से तौबा करने और अपनी आदत बदलने से अल्लाह उसे माफ़ कर देता है। “अगर तुम किसी गुनाह से जहालत में फिसल जाओ, फिर तौबा कर लो और अच्छे अमल करो — तो अल्लाह बख्शने वाला है, रहमत वाला है।”
(क़ुरआन 6:54)

इस्लाम में अदब एक मजबूरी नहीं, बल्कि एक शान है। यह अल्लाह की रहमत पाने का ज़रिया है और इंसानी रिश्तों को महफूज़ रखने का सबसे ताक़तवर हथियार। आइए, हम सब मिलकर ऐसी ज़बान, ऐसा बर्ताव और ऐसा समाज बनाएं — जहाँ हर इंसान को इज़्ज़त मिले, और हर ज़बान अल्लाह की इताअत में लगे।

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