औरतों के हक़ में इस्लाम की सुनहरी तालीम
इस्लाम हमेशा से औरतों के हक़ूक़ (अधिकारों) के मामले में बहस का केंद्र रहा है। दुनिया में एक आम धारणा है कि इस्लाम औरतों को उनके बुनियादी हक़ से महरूम करता है। आलोचक अक्सर कहते हैं, “मुसलमान अपनी औरतों को कमतर समझते हैं और उनके समाज में मर्दवाद हावी है।” मगर मुसलमानों के लिए यह बात कड़वी ज़रूर है, क्योंकि जो कुछ उन्होंने पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सीखा है, वह इन धाराणाओं के बिल्कुल खिलाफ है। अगर इस्लाम के शुरुआती दौर को देखा जाए, तो वही हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम थे जिन्होंने औरतों के हक़ के लिए अंधेरे दौर में चिराग़ की तरह रोशनी फैलाई। एक ऐसे समाज में जहाँ औरतों की तालीम का कोई रिवाज नहीं था, पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने औरतों की तालीम के लिए आवाज़ उठाई। उनकी बीवी, हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा, उस दौर की सबसे तालीमयाफ्ता हस्तियों में से थीं। वह कुरआन, हदीस, तिब्ब और अरब इतिहास में इतनी माहिर थीं कि उस वक़्त के ज़्यादातर मर्द भी उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने 2000 से ज़्यादा हदीस बयान की हैं। औरतों की तालीम पर ज़ोर देने का ही नतीजा था कि फातिमा अल-फिहरी ने दुनिया की पहली यूनिवर्सिटी अल-क़रावीयिन यूनिवर्सिटी (859 ईस्वी में फेज़, मोरक्को) क़ायम की। रुफैदा अल-अस्लमिया रज़ियल्लाहु अन्हा इस्लाम की पहली नर्स थीं जिन्होंने साइंस और मेडिसिन के मैदान में क़ाबिले-तारीफ़ काम किया। ख़ौला बिन्त अल-अजवार रज़ियल्लाहु अन्हा और नुसैबा बिन्त काअब रज़ियल्लाहु अन्हा जैसी ख़्वातीन भी थीं जिन्होंने बहादुरी के जौहर दिखाए। इस्लाम ने तालीम को हर मर्द और औरत पर फ़र्ज़ (ज़रूरी) कर दिया। पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया: “कोई बाप अपने बच्चे को अच्छी तालीम से बेहतर कोई चीज़ नहीं दे सकता।” यह हिदायत बेटों और बेटियों दोनों के लिए थी। किसी भी समाज में तरक़्क़ी मुमकिन नहीं जब औरतें तालीम से पीछे रह जाएँ। माँ की भूमिका बच्चे की परवरिश में अहम होती है, इसलिए माँ की तालीम से समझौता करना पूरे समाज के मुस्तक़बिल से समझौता करने जैसा है। पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बच्चियों को ज़िंदा दफ़्न करने की जहालत भरी रस्म को सख़्ती से मना किया। उन्होंने बेटियों को घर की इज़्ज़त और फ़ख़्र बताया और फ़रमाया: “खुशक़िस्मत है वह औरत जिसकी पहली औलाद बेटी हो।” उन्होंने बेटियों की परवरिश में नरमी और अच्छे सुलूक की तालीम दी। पैग़ंबर ने फ़रमाया:”जिसके यहाँ बेटी पैदा हो और वह उसे ज़िंदा रखे, उसकी तौहीन न करे और बेटों को उस पर तरजीह न दे, अल्लाह तआला उसे जन्नत में दाखिल करेगा।” एक और हदीस में फ़रमाया: “जिसके तीन बेटियाँ हों और वह उनकी अच्छी देखभाल करे, रहम करे, और उनकी मदद करे, उसके लिए जन्नत वाजिब है।”
पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपनी बेटी हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा से बेहद मोहब्बत थी। वह फ़रमाते: “फ़ातिमा मेरा हिस्सा है, जो उसे नाराज़ करेगा वह मुझे नाराज़ करेगा।” जब भी हज़रत फ़ातिमा उनके पास आतीं, वह उठकर उनका इस्तक़बाल करते, उनके हाथ चूमते और उन्हें अपनी जगह बिठाते।उनका अपनी बेटी के साथ यह व्यवहार दुनिया भर के लोगों के लिए मिसाल बना। उस दौर में जब औरतों को विरासत में हिस्सा नहीं मिलता था, पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने औरतों का मीरास (विरासत) में हिस्सा फ़र्ज़ कर दिया। नतीजतन अरब में बहुत सी मुसलमान औरतें कामयाब ताजिरा बनीं। उस दौर में जहाँ जबरदस्ती निकाह आम था, वहाँ पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़बरदस्ती के निकाह को अमान्य करार दिया। उन्होंने मर्दों को हिदायत दी: “तुम में सबसे बेहतरीन वह है जो अपनी बीवी के साथ सबसे अच्छा बर्ताव करता है।” पैग़ंबर खुद अपनी बीवी हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के साथ नर्मी और मुहब्बत से पेश आते, यहाँ तक कि उन्हें अपने हाथ से निवाला खिलाते। क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है:”और उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से जोड़े बनाए ताकि तुम उनके पास सुकून पाओ। और उसने तुम्हारे बीच मुहब्बत और रहमत पैदा कर दी।” (सूरह अर-रूम 30:21)। पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने माँ के मक़ाम को भी बहुत ऊँचा दर्जा दिया। एक सहाबी ने पूछा: “सबसे ज़्यादा हक़दार मेरे अच्छे सुलूक का कौन है?” पैग़ंबर ने तीन बार फ़रमाया:”तुम्हारी माँ।”फिर चौथी बार फ़रमाया: “फिर तुम्हारे बाप।” क़ुरआन में भी माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करने का हुक्म दिया गया है: “और हमने इंसान को अपने माँ-बाप के साथ भलाई करने का हुक्म दिया। उसकी माँ ने तकलीफ पर तकलीफ उठाकर उसे पेट में रखा और तकलीफ से उसे जन्म दिया…” (सूरह अल-अहकाफ़ 46:15) इल्म (ज्ञान) वह पानी है जो जहालत (अज्ञानता) की आग को बुझाता है। पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी पूरी ज़िंदगी औरतों के हक़ूक़ के लिए आवाज़ बुलंद की। यह बात बिल्कुल वाज़ेह है कि उन्होंने किस तरह की क़ीमती तालीम दी और किस तरह का रास्ता दुनिया के सामने पेश किया, जिससे पूरी इंसानियत को रोशनी मिली।
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