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माँ की ख़िदमत

Jaipur

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प्यारे दोस्तों! बहुत वक़्त पहले की बात है। किसी जगह हुज़ैल नाम का एक लड़का रहता था। उसकी माँ बहुत ही नेक और परहेज़गार थीं। उनका नाम हफ़्ज़ा बिन्ते सीरिन था।

सर्दियों का मौसम था। ठंड इतनी ज़्यादा थी कि हाथ-पाँव जम रहे थे। रात का वक़्त था और हुज़ैल की माँ हफ़्ज़ा अल्लाह की इबादत में मशग़ूल थीं।

हुज़ैल ने सोचा, “आज तो ठंड बहुत है, माँ के हाथ-पाँव ठंड से काँप रहे होंगे। क्यों न मैं एक अंगीठी जला कर माँ के पास रख दूँ ताकि वह अपने हाथ-पाँव सेंक लें।”

यह ख़्याल दिल में आते ही हुज़ैल फ़ौरन उठ खड़ा हुआ। उसने अंगीठी में आग जलाई और उसे लेकर माँ के पास पहुँचा।

माँ ने हैरानी से पूछा:

“बेटे, अंगीठी किसलिए लाए हो?”

बेटे ने अदब से जवाब दिया:

“अम्मी! आज ठंड बहुत ज़्यादा है। मैंने सोचा आपके हाथ-पाँव ठंड से काँप रहे होंगे, इसलिए अंगीठी लाया हूँ ताकि आप अपने हाथ-पाँव सेंक लें।”

यह बात सुनकर माँ बहुत खुश हुईं और अपने बेटे को दिल से दुआएँ दीं।

उसके बाद जब भी सर्द रात होती, हुज़ैल अंगीठी लेकर अपनी माँ के पास पहुँच जाता और कुछ देर वहीं बैठकर धुएँ को दूसरी तरफ़ करता रहता ताकि माँ को धुएँ से तकलीफ़ न हो।

देखा आपने! हुज़ैल कितना नेक और फ़रमाँबरदार बेटा था।

इस वाक़िये से हमें यह सबक मिलता है कि हमें भी अपने माँ-बाप की ख़िदमत करनी चाहिए, उन्हें तकलीफ़ नहीं देनी चाहिए। क्योंकि माँ के पैरों के नीचे जन्नत है और बाप जन्नत का दरवाज़ा।

अल्लाह तआला हम सबको अपने वालिदैन की ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

(मुहम्मद सुहैल)

 

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