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हज़रत इमाम शाफई : नासिर अल-हदीस

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मुसलमानों के सुन्नी फिरके के चार महान इमामों में से एक इमाम शाफ़ई हैं। उन्हें ‘नासिर अल-हदीस’ की उपाधि दी गई है जिसका अर्थ है “हदीस का रक्षक”। इमाम शाफ़ई, जिन्हें ‘शेख अल इस्लाम’ के नाम से भी जाना जाता है। इनकी विलादत ( जन्म) 150 हिजरी  में गाजा फिलस्तीन में हुई थी ।इसी साल इमाम अबू हनीफा रअ का विसाल (निधन) हुआ था । इमाम शाफ़ई हुज़ूरे पाक सल्लल्लाहो अलैहिवसल्लम के खानदान कुरेश से थे। बचपन में ही इमाम शाफ़ई के वालिद का इन्तकाल हो गया था और इनकी वालिदा मोहतरमा इनको लेकर अपने रिश्तेदारों के दरमियां मक्का आ गईं ताकि इनकी बेहतर परवरिश हो सके।कहा जाता है कि आप ने सात साल की छोटी उम्र में ही कुरान शरीफ़ याद (हिफ़्ज़)कर लिया था। आपने शुरुआती साल, दीनी तालीम हासिल कर ने के लिए मक्का और मदीना में बिताए । इमाम साहब खुद कहा करते थे कि:-

“कुरान सीखने के बाद, मैं मस्जिद जाता और विद्वानों के साथ बैठकर पैगंबर मुहम्मद (SAW) की बातें और इस्लामी मामलों पर चर्चा करता। मैं मक्का में तंबू में रहने वालों के बीच इतनी गरीबी में रहता था कि मैं लिखने के लिए कागज भी नहीं खरीद सकता था, इसलिए मैं पत्थरों और हड्डियों पर लिखता था।”

इमाम शाफ़ई की उम्र पंद्रह या अठारह साल ही रही होगी तभी उनके उस्ताद (शिक्षक इमाम मालिक रअ)ने उनको न्यायिक निर्णय (फतवा) जारी करने की अनुमति दे  दी थी। इमाम शाफ़ई ने इमाम हजरत मालिक की प्रसिद्ध पुस्तक अल मुवत्ता केवल 9 दिनों में याद कर ली, इसके बाद  इमाम शाफ़ई मदीना मुनव्वरा इमाम मालिक र‌‌‌ अ के घर गये और उनसे अर्ज़ किया कि मैं आपका शागिर्द बनना चाहता हूं । इस पर इमाम मालिक ने ग़ौर से उन्हें देखा और कहा कि कल किसी को साथ लेकर मेरे पास आना जो “अलमोवत्ता” अच्छी तरह से पढ़ने में मदद करे क्योंकि तुम अकेले नहीं पढ़ पाओगे । तब इमाम शाफ़ई ने अर्ज किया कि मैं इसे  बिना पढ़े ही ज़ुबानी आपको सुना सकता हूं । इस तरह इमाम मालिक ने  इमाम शाफ़ई को  इल्मे दीन सिखाया और 9 साल तक इमाम शाफ़ई मदीना में रहे । इमाम मालिक के विसाल (मृत्यु179 हिजरी) के बाद आप वापस मदीना मुनव्वरा से मक्का में आ गये। इमाम शाफ़ई  को यमन में राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। उस समय के खलीफ़ा हारून-अल-रशीद ने उनसे पूछताछ की और उन्हें सभी आरोपों से निर्दोष पाया और उन्हें बाइज़्ज़त बरी कर दिया। इसके तुरंत बाद, उनकी मुलाक़ात मुहम्मद बिन हसन अल-शैबानी से हुई जो इमाम अबू हनीफ़ा के सबसे महत्वपूर्ण शिष्यों में से एक थे। अल-शैबानी के साथ उनका संपर्क और चर्चाएँ बढ़ीं , जिससे आप का ज्ञान बढ़ा।   इमाम शाफ़ई ने अपनी यात्राओं के दौरान, जहाँ भी वे गए, उन्होंने बैठकें आयोजित कीं और अध्ययन मंडलियाँ आयोजित कीं, जिनमें अबू-थौर, अल-ज़फ़रानी, अल-करबीसी जैसे महान विद्वानों सहित कई लोग शामिल हुए। इमाम अहमद इब्न हंबल भी उनके मंडल में शामिल हुए और अल-शैबानी से अध्ययन किया।

इमाम शफीई ने मक्का, मदीना, कूफ़ा, बसरा, यमन, सीरिया और मिस्र जैसे विभिन्न स्थानों पर विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की। निम्नलिखित कुछ प्रमुख विद्वान हैं जिन्होंने इमाम शाफ़ई को इल्मे दीन सिखाया ।

  1. मुस्लिम बिन खालिद अल-ज़ंगी (मक्का में)
  2. सुफ़यान बिन उयैनाह अल-हिलाली (मक्का में)
  3. इब्राहिम बिन याह्या (मदीना में)
  4. इमाम मालिक बिन अनस (मदीना में)
  5. वाकी बिन अल-जर्राह बिन मालेह अल-कोफ़ी (कुफ़ा में)
  6. मुहम्मद बिन हसन अल-शैबानी (बसरा में) इन्होंने इमाम अबू हनीफा र अ से इल्म हासिल किया था और ये उनके सबसे अच्छे शिष्यों में से एक शिष्य थे।
  7. हम्माद बिन उसामा अल-हाशिमी अल-कोफ़ी (कुफ़ा में)
  8. अब्दुल-वहाब बिन अब्दुल-मजीद अल-बुसरी (बसरा में)

इमाम शाफ़ई के बहुत से शागिर्द थे जिनमें से कुछ ने बहुत मकबूलियत हासिल की थी। कुछ शिष्यों के नाम ये है:-

  1. इमाम अबू याकूब अल-बुवैती
  2. अबू इब्राहिम इस्माइल इब्न याह्या अल-मुज़ानी
  3. रबी बिन सुलेमान अल-मुरादी
  4. अबू अली अल-करबीसी
  5. इब्राहीम बिन खालिद अबू थावर

इमाम शाफ़ई ने इमाम अहमद बिन हम्बल से भी मुलाकात की और दोनों के बीच आपसी ज्ञान का आदान-प्रदान किया। इमाम अहमद बिन हम्बल ने एक बार कहा था: “अगर इमाम शाफ़ई न होते, तो हम हदीस  समझ नहीं पाते।”

इमाम शाफ़ई ने 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

  1. किताब अल-उम्म
  2. अल-रिसाला
  3. इख़्तिलाफ़ अल-हदीस
  4. अल-इमला
  5. इख़्तिलाफ़ अल-इराक़ियानी
  6. जिमा अल-इल्म
  7. इख्तिलाफ मलिक वा अल-शफ़ीई
  8. किताब अल-हुज्जा

इमाम शाफ़ई का आखीरी दौर  मिस्र में रहा  जहाँ वे अपनी आखिरी सांस तक रहे। इमाम मालिक र अ  के शिष्य होने और फ़िक़्ह में उनकी प्रतिष्ठा के कारण मिस्र के लोगों और विद्वानों में उनका बहुत सम्मान और आदर था। माना जाता है कि उनका निधन (विसाल) इस्लामी कैलेंडर के महीने रजब के शुक्रवार को 54 वर्ष की आयु में वर्ष 204 एएच (820 ई.) में हुआ था। उस समय मिस्र के गवर्नर ने न केवल उनके अंतिम संस्कार में भाग लिया बल्कि  उनकी शैक्षणिक उत्कृष्टता को स्वीकार किया। उनके दो बेटे अबुल हसन मुहम्मद और उथमान अंतिम संस्कार के लिए मौजूद थे। इमाम शाफ़ई  को मिस्र के काहिरा में मुक़त्तम पहाड़ियों की तलहटी में बानू अब्द अल-हकम के तहखाने में दफनाया गया। इमाम शाफ़ई को मानने वाले ज़्यादातर लोग पूर्वी अफ्रीका , अरब के कुछ हिस्सों और इंडोनेशिया के साथ-साथ कुर्दों में भी प्रमुख है। इसके अलावा यमन, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर और भारत में भी इनको मानने वाले हैं।

संकलन कर्ता :- फ़ज़लुर्रहमान

सहायक सचिव सेवानिवृत्त

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