मेहनत या तक़दीर? ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सवाल
इंसान की ज़िन्दगी दो चीज़ों पर चलती है – तक़दीर और मेहनत। हम बचपन से सुनते आए हैं कि “तक़दीर में जो लिखा है, वही होगा”, और ये बात बिलकुल सही है। लेकिन बहुत से लोग तक़दीर का गलत मतलब ले लेते हैं। कुछ लोग तक़दीर के भरोसे पर बैठ जाते हैं और मेहनत ही छोड़ देते हैं, जबकि कुछ लोग मेहनत में इतने मशगूल हो जाते हैं कि तक़दीर और अल्लाह को भूल जाते हैं, फिर नतीजों को लेकर तनाव में रहने लगते हैं। यही मसला हर इंसान की ज़िन्दगी में किसी न किसी रूप में आता है। आज हम इसी पर बात करते हैं।
तक़दीर का सही मतलब
तक़दीर का मतलब यह नहीं कि इंसान मजबूर है। इसका सही मतलब है कि अल्लाह तआला हर चीज़ को पहले से जानता है और अपनी हिकमत से लिख देता है।
कुरआन में साफ़ फरमाया गया:
“हमने हर चीज़ को एक तय माप और तक़दीर के साथ पैदा किया।” (क़मर: 49)
मगर याद रखिए, अल्लाह ने इंसान को इख़्तियार यानी चॉइस दी है। हमें रास्ता चुनने की आज़ादी है और उसी के मुताबिक़ हमारा हिसाब होगा।
मेहनत की अहमियत
कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है:
“इंसान को वही मिलेगा जिसकी उसने कोशिश की।” (नज्म: 39)
आखरी पैगम्बर ने भी फरमाया:
“मजबूत मोमिन कमज़ोर मोमिन से बेहतर और प्यारा है। जिस चीज़ से तुम्हें फायदा हो, उसे हासिल करने की कोशिश करो, अल्लाह से मदद मांगो और मायूस मत हो।” (मुस्लिम)
यानि मेहनत छोड़ना इस्लाम में जायज़ नहीं, बल्कि कोशिश करना भी ईमान का हिस्सा है।
तक़दीर और कोशिश का ताल्लुक़
कोशिश करना दरअसल तक़दीर का हिस्सा ही है। जो इंसान मेहनत करता है, वही अपनी लिखी हुई क़िस्मत को पाता है।
आखरी पैगम्बर से सहाबा ने पूछा: “क्या हम कोशिश छोड़ दें और सिर्फ तक़दीर पर भरोसा कर लें?”
तो आपने फरमाया:
“नहीं! कोशिश करो, हर एक को उसी के लिए आसान कर दिया गया है जिसके लिए उसे पैदा किया गया है।” हमें किन गलत सोच से बचना चाहिए?
- सिर्फ तक़दीर पर भरोसा करके मेहनत छोड़ देना।
- सिर्फ मेहनत पर घमण्ड करके अल्लाह को भूल जाना।
सही रास्ता ये है कि मेहनत करो, दुआ करो और नतीजा अल्लाह पर छोड़ दो।
इस्लाम का पैग़ाम साफ़ है – तक़दीर को मानो लेकिन कोशिश मत छोड़ो। मेहनत इंसान का फ़र्ज़ है और नतीजा अल्लाह के हाथ में है। यही बैलेंस इंसान को मायूसी से भी बचाता है और घमण्ड से भी। (मुहम्मद सोहैल)
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