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ग़ज़ल

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ज़माने के बारे मैं लिखने से पहले

बहुत  सोच  लेना मिलने से पहले

नहीं  तो  बहुत  पछताना  पड़ेगा

मरहम रख लेना जलने से पहले

                      अकेले  अकेले  पिए  जा  रहे हैं

                      नीरस सा जीवन जिए जा रहें हैं

                       बुलाते  नहीं  और  आते  नहीं हैं

                       वादे  पर  वादे  किए  जा  रहे  हैं

मेरी जान इतनी भी सस्ती नहीं है

कौड़ी की बोली लगाया करो ना

बड़ी मुश्किलों से पाया है तुमको

क़रीब आ के दूर जाया करो ना

                            खुश कैसे रहें समझाते नहीं

                            पास बुलाते मगर आते नहीं

                            चाहते तो सब कुछ हैं हमसे

                            संसार  अपना  दिखाते  नहीं

ज़िन्दगी में तमाशे बहुत से मिले

मिलना जिसे था वो ही ना मिले

                    कहानियां कभी आसान नहीं होती

                    ज़िन्दगी होती है मेहमान नहीं होती

सब-कुछ  तेरे चरनों  में निछावर  कर दिया

प्यार में ना पूछ सब-कुछ उजागर कर दिया

सूखी  टहनी जानकर  छोड़ आए  थे  कभी

तेरी मेहनत  के सिले  ने वो शजर कर दिया

        सुबह सफ़र में निकलना है ज़िन्दगी तुझ को

       सुकूने ज़ीस्त की खातिर तलाशे यार के लिए

 

तख़लीक़:- फ़ज़लुर्रहमान

सहायक सचिव (सेवा निवृत्त)

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