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हर कण मुझे दे दो

Jaipur

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तुम्हारी  सुरमई आंखों  में  चिनगारी  सुलगने  दो

सुलगने दो तुम्हारी देह की इच्छा ओं को खुलकर

तरसने  पाऐ  ना  कोई  भी हसरत  तेरी अब  छिपकर

मचलने दो तुम्हारी मौसमी इच्छाओं को जम कर

 

धरा  पर जब  गिरेगा  कुछ  अंधेरा  आसमानों  से

गुनाह की कश्तियां निकलेंगी तब इन्हीं मकानों से

कोई  उधड़ा हुआ  साया  मिलेगा रात के दिल पर

सुबह  नज़रें  उठेगीं  बस तुम्हारे  गाल के तिल पर

 

ना बहको रुक भी जाओ ज़िद तुम्हारी हद से न गुज़रे

ज़रा  देखो  के  कितने  हादसे   हैं   वक़्त  पर  बिखरे

तरलता  पांव  की  ले  जाएगी  तुम  को  बहा  कर तो

तुम्हें  ये  ज़िन्दगी   हर  मोड़  पर  देगी  फक़त  फिकरे

 

तो आओ यह जो मेरे नाम की चादर है तुम ले लो

तुम्हारी  चांदनी  सी  देह  का  हर  कण  मुझे दे दो, हर कण मुझे दे दो

 

तख़लीक़:- फ़ज़लुर्रहमान

सहायक सचिव सेवानिवृत्त

मोबाईल नं9828668877

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