इस्लाम में फर्ज है रोज़ा
- दूसरी क़िस्त
रोजें की एक दूसरी खूबी भी है और वह यह है कि यह एक लम्बी मुद्दत तक शरीअत के हुक्मो की लगातार इताअत कराता है। नमाज़ की मुद्दत एक वक्त में कुछ मिनट से ज्य़ादा नहीं होती। ज़कात अदा करने का वक्त साल भर में सिर्फ़ एक बार आता है । हज में अलबत्ता लम्बी मुद्दत लगती है, मगर इसका मौका ज़िंदगी भर में एक बार आता है और वह भी सब के लिए नहीं। इन सबके बरखिलाफ रोज़़ा हर साल पूरे एक महीने तक दिन-रात शरीअते मुहम्मदी की पैरवी की मश्क कराता है। सुबह सहरी के लिए उठो, ठीक फलां वक़्त पर खाना-पीना सब बन्द कर दो। दिन भर भूके प्यासे रहो फिर शाम को इफ़्तार करो, फिर खाना खाकर आराम करो, फिर तरावीह के लिए दौड़़ो। इस तरह हर साल पूरे महीने भर सुबह से शाम तक और शाम से सुबह तक मुसलमान को लगातार फौजी सिपाहियों की तरह पूरे कायदे और ज़़ाब्ते में बांधकर रखा जाता है और फिर ग्यारह महीने के लिए उसे छोड़ दिया जाता है । ताकि जो तर्बबियत इस महीने में उसने हासिल की है, उसके असरात ज़़ाहिर हो और जो कमी पाई जाए, वह फिर दूसरे साल की ट्रेनिंग में पूरी की जाए। इस तरह की ट्रेनिंग के लिए एक-एक आदमी को अलग-अलग लेकर तैयार करना किसी तरह मुनासिब नहीं होगा। फौज में भी आप देखते हैं कि एक-एक आदमी को अलग-अलग परेड नहीं कराई जाती, बल्कि पूरी फौज एक साथ परेड करती है। सबको एक वक़्त एक बिगुल की आवाज़ पर उठना और बिगुल की आवाज़ पर काम करना होता है । ताकि उसमें जमाअत बनकर एक साथ काम करने की आदत हो और उसके साथ ही वे सब एक दूसरे की ट्रेनिंग में मददगार भी हो, यानी एक आदमी की ट्रेनिंग में जो कुछ कमी रह जाए उसकी कमी को दूसरा और दूसरे की कमी को तीसरा पूरा कर दे। इसी तरह इस्लाम में रमज़़ान का महीना शुरू होते ही इबादत के लिए मख्सूस किया गया और तमाम मुसलमानों को हुक्म दिया गया कि एक वक़्त में सबके सब मिलकर रोज़़ा रखें। उसने अलग-अलग की इबादत को एक साथ की इबादत बना दिया। जिस तरह एक तादाद को लाख से ज़रब करो, तो लाख की ज़बर्दस्त तादाद बन जाती है । उसी तरह एक आदमी के रोज़़ा रखने से जो अख्लाकी एवं रूहानी फायदे हो सकते हैं, लाखों करोड़ों आदमियों के मिलकर रोज़़ा रखने से वह लाखों करोड़ों गुना बढ़ जाते हैं। रमजान का महीना पूरी फ़िज़़ा को नेकी और परहेज़गारी की रूह से भर देता है। पूरी कौम में गोया तकवा और परहेजगारी की खेती हरी-भरी हो जाती है। हर आदमी न सिर्फ गुनाहो से बचने की कोशिश करता है, बल्कि अगर उसमें कोई कमजोरी होती है तो उसके दूसरे बहुत से भाई जो इसी तरह के रोज़़ेदार हैं, उसके मददगार बन जाते हैं। हर आदमी को रोज़़ा रखकर गुनाह करने में शर्म आती है और हर एक के दिल में खुद ही ख्वाहिश उभरती है कुछ भलाई के काम करे, किसी गरीब को खाना खिलाये। किसी नंगे को कपड़़ा पहनाये, किसी दु:खी की मदद करे, किसी जगह अगर कोई नेक काम हो रहा हो तो उसमें हिस्सा ले और अगर कहीं खुल्लम-खुल्ला बुराई हो रही हो, तो उसे रोकें। नेकी और तकवा का एक आम माहौल पैदा हो जाता है और भलाइयों के फलने-फूलने का मौसम आ जाता है। जिस प्रकार आप देखते हैं हर गल्ला अपने मौसम आने पर खूब फलता-फूलता है और हर ओर खेतों पर छाया नजर आता है। इसीलिए नबी सल्लललहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि आदमी का हर अमल खुदा के यहां कुछ न कुछ बढ़ता है।
एक नेकी दस गुनी से सात सौ गुनी तक फुलती-फलती है, मगर अल्लाह तआला फरमाता है कि रोज़़ा इससे अलग है। वह खास मेरे लिए है और मैं उसका जितना चाहता हूँ, बदला देता हूँ। इस हदीस से मालूम हुआ कि नेकी करने वालो की नीयत और नेकी के नतीजो के लिहाज़ से तमाम आमाल फूलते-फलते हैं और उनकी तरक़्की के लिए एक हद मुकर्रर है, लेकिन रोज़़े की तरक्की के लिए कोई हद मुकर्रर नहीं है। रमजान चूंकि नेकी और भलाई के फूलने-फलने का मौसम है और इस मौसम में एक आदमी नहीं, बल्कि लाखों करोड़ों मुसलमान मिलकर इस नेकी के बाग को पानी देते हैं, इसलिए वह बेहद बे-हिसाब बढ़ सकता है। जितनी ज्य़ादा नेक नीयती के साथ इस महीने में आप अमल करेंगे जिस कद्र ज्य़ादा बरकतों से खुद फायदा उठायेंगे और अपने दूसरे भाइयो को फायदा पहुचाएंगे और फिर जिस कद्र ज्य़ादा इस महीने के असरात बाद के ग्यारह महीनों में बाकी रखेंगे, उतना ही यह फूले-फलेगा और इसके फूलने-फलने की कोई हद नही है। आप खुद अपने अमल से इसको महदूद कर लें, तो यह आपका अपना कुसूर है। रोज़़े के यह असरात व नतायज सुनकर आप में से हर आदमी के दिल में यह सवाल पैदा होगा कि यह असरात आज कहां हैं। हम रोज़़े भी रखते हैं मगर ये नतीजे ज़़ाहिर नहीं होते । इसकी एक वजह तो आपसे बयान की जा चुकी है और वह यह है कि इस्लाम के अंगों को अलग-अलग कर देने के बाद और बहुत-सी नई चीजेें इसमें मिला देने के बाद आप उन नतीजों की उम्मीद नहीं कर सकते जो पूरे निज़़ाम की बंधी हुई सूरत ही में ज़़ाहिर हो सकते हैं। इसके अलावा दूसरी वजह यह है कि इबादत के बारे में आपके सोचने का ढंग बिल्कुल बदल गया है। अब आप यह समझने लगे हैं कि सिर्फ़ सुबह से शाम तक कुछ न खाने-पीने का नाम इबादत है और जब यह काम आपने कर लिया तो इबादत पूरी हो गई। इसी तरह दूसरी इबादतों की भी केवल ज़़ाहिरी शक्ल को आप इबादत समझते हैं और इबादत की असली रूह जो आपके हर अमल में होनी चाहिये । इससे आमतौर पर आपके 99 प्रतिशत बल्कि इससे भी ज्य़ादा आदमी गाफ़िल हैं। इसी वजह से ये इबादतें अपने पूरे फायदे नहीं दिखाती, क्योंकि इस्लाम में तो नीयत और फहम और समझ-बूझ ही सब कुछ मुनहसिर है। हर काम जो इन्सान करता है, उसमें दो चीज़ें जरूर ही हुआ करती हैं। एक चीज़ तो मक़सद है, जिसके लिए काम किया जाता है और दूसरी चीज़ उस काम की खास शक्ल है जो इस मक़सद को हासिल करने के लिए इख्तियार की जाती है। मिसाल के तौर पर खाना खाने के काम को लीजिए। खाने से आपका मक़सद जि़न्दा रहना और जिस्म की ताकत को बहाल रखना है। इस मक़सद को हासिल करने की सूरत यह है कि आप निवाले बनाते हैं, मुंह में ले जाते हैं, दांतो से चबाते हैं और हलक से नीचे उतारते हैं। चूंकि इस मक़सद को हासिल करने के लिए सबसे ज्य़ादा फायदेमन्द और सबसे बेहतरीन तरीका यही हो सकता था । इसलिए आपने इसी को इख्तियार किया। लेकिन आप में से हर आदमी जानता है कि असल चीज़ वह मक़सद है, जिसके लिए खाना खाया जाता है, न कि खाने के काम की यह शक्ल। अगर कोई आदमी लकड़ी का बुरादा या राख या मिट्टी लेकर उसके निवाले बनाये और मुंह में ले जाये और दांतो से चबाकर हलक से नीचे उतार ले, तो आप उसे क्या कहेंगे ? यही न कि उसका दिमाग खराब है। क्यों इसलिए कि वह खाने के असल मक़सद को नहीं समझता है और इस भ्रम में फंसा हुआ है कि बस खाने के काम की इन चार ज़़ाहिरी बातों को अदा कर देने का नाम खाना खाना है। इसी तरह आप उस आदमी को भी पागल ठहरायेंगे जो रोटी खाने के बाद फौरन ही हलक में उंगली डालकर के कर देता हो और फिर शिकायत करता हो कि रोटी खाने के जो फायदे बयान किये जाते हैं, वे मुझे हासिल ही नहीं होते, बल्कि उल्टा मैं तो रोज़-ब-रोज़ दुबला होता जा रहा हूँ और मर जाने की नौबत आ गई है। यह मूर्ख अपनी इस कमज़़ोरी का इल्जाम रोटी और खाने पर रखता है। हालांकि बेवकूफी उसकी अपनी है। उसने अपनी नादानी से यह समझ लिया कि खाने के काम में ये जो चन्द ज़़ाहिरी बातें हैं, बस इन्हीं को अदा कर देने से ही जि़न्दगी की ताकत हासिल हो जाती है। इसलिए उसने सोचा कि रोटी का बोझ अपने मैदे में क्यों रखे। क्यों न इसे निकाल फेंका जाये, ताकि पेट हल्का हो जाये। खाने के काम की ज़़ाहिरी सूरत तो मैं अदा ही कर चुका हूँ। यह बेवकूफी का ख्य़ाल जो उसने कायम किया और फिर उसकी पैरवी की, इसकी सज़़ा भी तो आखिर उसी को भुगतना चाहिए। उसको जानना चाहिए कि रोटी पेट में जाकर हज़म न हो और खून बनकर सारे जिस्म में फैल न जाये, उस वक़्त तक जि़न्दगी की ताकत हासिल नही हो सकती। खाने के ज़़ाहिरी काम भी यो तो ज़रूरी हैं, क्योंकि इनके बिना रोटी मैदे तक नहीं पहुंच सकती, मगर सिर्फ इन ज़़ाहिरी कामों के अदा कर देने से काम नहीं चल सकता। इन कामों में कोई जादू भरा हुआ नहीं है कि उन्हें अदा करने से बस जादुई तरीके पर आदमी की रगों में खून दौडऩे लगता हो। खून पैदा करने के लिए तो अल्लाह ने जो कानून बनाया है, उसी के मुताबिक वह पैदा होगा। उसको तोड़ दोगे तो अपने आपको खुद ही मौत के घाट उतारोगे।
जारी…
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